देवभूमि के इस पेड़ की बात ही कुछ और है नाम भी है कमाल का

आज हम जानेंगे उत्तराखंड के एक ऐसे ही पेड़ महाबली भीम के नाम जैसा ही जी हाँ हम बात करेंगे भीमल के पेड़ की तो चलिए शुरू करते हैं ये रोचक जानकारी-

ये हमारे राज्य उत्तराखंड का एक प्रमुख वृक्ष है जिसका वैज्ञानिक नाम भी जान लेते हैं ग्रेविया अपोजीसीपोलिया नाम से प्रसिद्ध ये वृक्ष उत्तराखंड के दोनों क्षेत्रों में कुमाऊँ मण्डल और गढ़वाल मण्डल में अत्यधिक मात्रा में पाया जाता है। इसके और भी कई नाम है कुछ जगह पर भ्यूल, तो कहीं पर भीमु, कही भीमल, तो कही भेकू नाम से इसको जाना जाता है। यह लगभग 400 मीटर से लेकर 1500 मीटर तक की ऊँचाई वाले पहाड़ी क्षेत्रों में प्रचुर मात्रा में उगाया जा सकता है।

इस पेड़ की ऊँचाई अधिकतम 15 से 18 मीटर तक हो सकती है। इस पेड़ के फूल हल्के पीले व सफेद रंग के होते हैं । इसके एक फूल पर कम से कम चार या पाँच तक बीज आते हैं, जब ये फल कच्चे होते हैं तो ये हरे रंग के होते हैं मगर पक जाने पर ये फल गहरे काले रंग के हो जाते हैं। इसके पके हुए फल बहुत मीठे होते हैं। कुछ बच्चे या बड़े इनके फलों को खाते भी हैं, इन फलों को खाने पर होंठ और जीभ का रंग गहरा लाल हो जाता है, ऐसा लगता है मानो कि उस बच्चे ने या बड़े व्यक्ति ने पान खाया हो। इसके ये पके फल बन्दरों और पक्षियों को भी बहुत अच्छे लगते हैं इसलिए वे भी बड़े चाव से इसके पके फलों को कहते हैं। मधुमक्खी भी इसके फूलों का रस बड़े ही आनन्द पूर्वक चूसती है।

इस पेड़ की लम्बी लम्बी जड़ें उस जगह पर होने वाले भूमि कटान को रोकने में पूरी तरह सक्षम होती हैं। इस पेड़ की लकड़ियाँ बहुत ही उपयोगी सिद्ध होती हैं इनको पानी में कुछ दिनों तक भीगने के लिए अच्छी तरह से पत्थरों से दबा कर छोड़ दिया जाता है, जब ये पूर्णतया भीग जाती हैं और अपने रेशों को लगभग छोड़ने के स्थिति में आ जाती हैं तो इनको पानी से निकलकर हल्का सुखाया जाता है फिर इसके रेशों को इसकी लकड़ी से अलग कर लिया जाता है लकड़ी को अच्छी तरह सुखाकर ईंधन के रूप में प्रयोग किया जाता हैं जबकि रेशों से कई प्रकार की चीजें जैसे रस्सी, चटाई, बैग, बैलों के लिए मुहाव, यहाँ तक कि चप्पल भी बनाई जा सकती हैं।

इसकी लकड़ियाँ बहुत जल्दी आग पकड़ लेती हैं जिससे ये पुराने समय के लोगों के लिए रात में चिराग की तरह काम करती थीं। पुराने समय के लोग रात में टार्च की जगह इसकी लकड़ियों का उजाले के लिए इस्तेमाल करते थे।इसकी पत्तियों को गाय, भैंस के अतिरिक्त लगभग सभी पालतू जानवर बकरी, भेड़, बैल,आदि बड़े चाव से खाते हैं, ऐसा माना जाते आ रहा है कि इसकी पत्तियाँ खाने वाले दुधारू पशुओं का दूध भी बढ़ जाता हैं।

यानि वो पहले से कुछ ज्यादा दूध देने लग जाती हैं। इस पेड़ की टहनियों में वर्ष भर में ही एक से दो मीटर तक की वृद्धि होने की क्षमता है। इसकी छाल को कूटकर प्राचीन समय में शैम्पू के रूप में प्रयोग किया जाता था, इससे सिर के परजीवी जुवें और लीखे भी समाप्त हो जाते हैं और बाल लम्बे, घने काले और मुलायम रहते हैं, आप भी जरूर आजमाएं ये आज भी उतनी ही असरदार है जितनी तब थीं।

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