टाटा नैनो (Tata Nano) असफ़ल क्यों हुई?

टाटा नैनो की भारत मे असफलता का मुख्य कारण इसकी डिजाइन और घटिया इंजन रहा है। टाटा ने कीमत कम रखने के उद्देश्य से इंजन क्वालिटी में समझौता किया।

नैनो भारत के ऑटोमोबाइल बाजार में पहली कार थी जिसे टू-सिलेंडर टेक्नोलॉजी पर 624 सी.सी. इंजन क्षमता का बनाया गया था जबकि बाजार में मौजूद नैनो की सभी प्रतिस्पर्धी कारें थ्री सिलेंडर टेक्नोलॉजी पर बनी न्यूनतम 800 सी.सी. इंजन क्षमता में थी।

टू-सिलेंडर इंजन होने के कारण कार में वाइब्रेशन अधिक था तथा माइलेज भी उल्लेखनीय नही था। टू-सिलेंडर इंजन का साउंड ऑटो रिक्शा जैसा होने से यह चलाने में कार जैसा अहसास नही देती थी। अतः शुरुआती दौर में ही यह मारुति की ऑल्टो 800 के सामने दम तोड़ती नजर आई।

सीमित इंजन एवं सिलेंडर क्षमता के बावजूद भी इस गाड़ी का ए.सी. वेरियंट भी लांच किया गया। ए.सी. ऑन करने के बाद पहाड़ी मार्ग तो छोड़िये समतल रोड़ पर भी गाड़ी ओवरलोड होने लगती थी।

नैनो की असफलता ने टाटा की हेवी मोटर वेहिकल्स में बनी प्रतिष्ठा को गहरी चोंट पहुंचाई है।

आज टाटा की बेहतरीन कारें ऑटोमोबाइल बाजार में उपलब्ध है जिनमे न सिर्फ नवीनतम टेक्नोलॉजी का प्रयोग हुआ है बल्कि सेफ्टी फीचर के मामले में भी अव्वल है किंतु मार्केटिंग के नियम बहुत ही कठोर होते है जिनमे सिर्फ वर्तमान ही नही देखा जाता है वरन पुराने पापों का प्रायश्चित्त भी करना पड़ता है जो आज टाटा लाइट मोटर वेहीकल्स को करना पड़ रहा है।

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