क्यों सुपारी को श्री गणेश समझ कर पूजते हैं, जानिए

प्रथम: सुपारी का उपयोग आदि काल से वैदिक धार्मिक अनुष्ठानों में होता आ रहा है। सुपारी का उपयोग मान्यता एवं विश्वास पर आधारित है।

पुरातन काल से यह मान्यता रही है कि सुपारी जो कि एक जंगली बीज है, में समस्त देवताओं का वास होता है एवं आव्हान करने पर संबंधित देव सुलभता से सुपारी में प्रतिष्ठित हो जाते हैं।

पुजा की सुपारी में नवग्रहों का वास भी माना जाता है एवं नवग्रह शांति के समय सुपारी को ग्रह प्रतिनिधि के रूप में उपयोग किया जाता है।

आमतौर पुजा की सुपारी छोटी,गोल एवं शीर्ष पर नुकीली होती है एवं इसका आधार समतल होता है जिससे सुपारी की स्थापना आसान हो जाती है।

पुरातन काल में धातु की उपलब्धता सुगम न होने से, धातु की गणेश की मूर्ति की उपलब्धता भी आसान न होती थी, ऐसी परिस्थिति में सुपारी की सुगम उपलब्धता ने एवं गणपति से साम्यता होने से, सुपारी को सहजता से गणेशजी के प्रतिनिधि के रूप में मान्यता मिली।

वैदिक एवं धार्मिक अनुष्ठानों में प्रथम पुजनीय गणपति की प्रतिमा स्थापना आवश्यक ही नहीं वरन अनिवार्य होती थी।

सुपारी को किसी ग्रह के स्थापन्न प्रतिनिधि के रूप में भी मान्यता मिली हुई है।

सुपारी को किसी धार्मिक अनुष्ठान में यजमान की अर्द्धांगिनी के स्थापन्न के लिए भी मान्यता मिली हुई है। भगवान श्रीराम ने माता सीता की अनुपस्थिति में सुपारी को ही अपनी भार्या के रूप में स्थापित किया था एवं अपना अनुष्ठान पूर्ण किया था।

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