हनुमान जी के पुत्र मकरध्वज और हनुमान जी की पहली मुलाकात कैसे हुई?

संक्षेप में कथा ये है कि रावण अपने भाई अहिरावण को सहायता के लिए बुलाता है और अहिरावण अपनी माया से श्रीराम और लक्ष्मण का अपहरण कर लेता है। जब सबको पता चलता है कि श्रीराम और लक्ष्मण शिविर में नहीं हैं तो सभी चिंतित हो जाते हैं। विभीषण द्वारा ये पुष्टि करने पर कि दोनों भाइयों को अहिरावण ले गया है, हनुमान उन्हें मुक्त करवाने पाताल लोक पहुँचते हैं। जब वे पाताल लोक के मुख्य द्वार पर पहुँचते हैं तो उन्हें वहाँ एक वानर द्वार की रक्षा करते हुए दिखता है।

एक वानर को इस प्रकार अहिरावण के महल की रक्षा करता देख हनुमान आश्चर्यचकित रह जाते हैं। साथ ही उस युवा वानर को देख कर हनुमान के मन में अनायास उसके प्रति स्नेह की भावना जग जाती है। वे उसके पास जाते हैं और उसका परिचय पूछते हैं। एक अन्य वानर को पाताल में अपने समक्ष देख कर वो युवा वानर भी आश्चर्य से भर जाता है किन्तु अथिति समझ कर वो हनुमान से कहता है – “हे कपिश्रेष्ठ! मेरा नाम मकरध्वज है और मैं पवनपुत्र मारुति का पुत्र हूँ।”

उसे इस प्रकार बोलते देख कर हनुमान कहते है – “हे युवक! तुम वेश भूषा से ज्ञानी लगते हो किन्तु तुम्हे इस प्रकार असत्य वचन नहीं बोलना चाहिए। हनुमान तो बाल ब्रह्मचारी है। फिर किस प्रकार तुम उनके पुत्र हो सकते हो?”

इसपर मकरध्वज ने कहा – “हे ज्येष्ठ! मैं असत्य वचन नहीं कहता। मेरे पिताश्री को जब महाराज रावण ने लंका में बंदी बनाया तो उनकी पूछ में आग लगा दी। उसी अग्नि से मेरे पिता हनुमान ने पूरी लंका को जला डाला। लंका नगरी के जलने के कारण उत्पन्न हुए ताप से हनुमान व्यथित हो गए और शीतलता के लिए समुद्र के जल में उतर गए। इतने श्रम को करने के कारण उनके शरीर से स्वेद गिरने लगा जिसे उसी समुद्र में रहने वाली एक मकर ने निगल लिया। महापराक्रमी हनुमान के स्वेद को निगलने के कारण वो मकर गर्भवती हो गयी। कुछ समय के पश्चात मेरे स्वामी अहिरावण ने शिकार कर उस मकर को पकड़ा और जब उसका उदर चीरा गया तो उसी से मेरी उत्पत्ति हुई। मकर के शरीर से उत्पन्न होने के कारण महाराज अहिरावण ने मेरा नाम मकरध्वज रखा।”

उसे इस प्रकार बोलते देख कर हनुमान ने कहा – “तुम्हे अपने जन्म का रहस्य कैसे पता चला? अगर ये रहस्य तुम्हे अहिरावण ने बताया है तो इसकी सत्यता पर मुझे संदेह है क्यूंकि राक्षस इस प्रकार की कहानी बनाने में निपुण हैं।”

तब मकर ध्वज ने कहा – “कपिश्रेष्ठ! ये कथा मुझे मेरे स्वामी ने नहीं अपितु स्वयं देवर्षि नारद ने सुनाई है।” इसपर हनुमान ने कहा – “यदि ये कथन देवर्षि का है तब तो ये निश्चय ही सत्य होगा।” तब मकरध्वज ने हनुमान से उनका परिचय पूछा।

तब हनुमान ने प्रसन्नतापूर्वक उसे अपना परिचय दिया। अपने पिता को अपने सामने देख कर मकरध्वज उनके चरणों में गिर पड़ा और उन्हें अपने अश्रुओं से धो डाला। हनुमान ने उसे अपने ह्रदय से लगाया और कहा कि आज अपने पुत्र को अपने सामने देख कर उन्हें अत्यंत प्रसन्नता हो रही है। फिर उन्होंने कहा कि अहिरावण उनके आराध्य श्रीराम और उनके भाई लक्ष्मण को पाताल लोक लेकर आया है। इसपर मकरध्वज ने भी इस बात की पुष्टि की कि आज ही अहिरावण दो वनवासियों को अचेतावस्था में अपने महल में लेकर आया है।

तब हनुमान उन दोनों को छुड़ाने के लिए पाताल लोक में प्रवेश करना चाहते हैं किन्तु मकरध्वज ने उन्हें रोकते हुए कहा – “हे पिताश्री! मैं विवश हूँ किन्तु मैं आपको पाताल लोक में प्रवेश करने की आज्ञा नहीं दे सकता। ये सत्य है कि आप मेरे पिता हैं और आपकी आज्ञा का पालन करना मेरा कर्तव्य है किन्तु फिर भी मैं अपने स्वामी के प्रति सेवा के कर्तव्य से बंधा हुआ हूँ। अतः अगर आप अंदर जाना चाहते हैं तो आपको मुझसे युद्ध करना होगा।

समय बहुत कम था इसी कारण हनुमान को अपने पुत्र से युद्ध करना पड़ा। मकरध्वज निश्चय ही पराक्रमी था किन्तु हनुमान के बल को कौन पार पा सका है? हनुमान उसे अंततः परास्त कर देते हैं और उसे उसी की पूछ से बांध कर वही द्वार पर छोड़ देते हैं। फिर अहिरावण की यञशाला में जाकर हनुमान पंचमुखी रूप धारण करते हैं और पांच दीपकों को एक साथ बुझाते हैं जिससे अहिरावण का अंत हो जाता है।

इस प्रकार हनुमान श्रीराम और लक्ष्मण को अहिरावण की कैद से छुड़ा कर बाहर आते हैं। वहाँ द्वार पर एक वानर को उसी की पूँछ में जकड़ा देख कर श्रीराम हनुमान से पूछते हैं कि ये कौन है? तब हनुमान उन्हें बताते हैं कि वो उनका पुत्र मकरध्वज है। ये जानने के बाद श्रीराम उसे कैद से मुक्त करते हैं और वही उसका राज्याभिषेक कर मकरध्वज को पाताल लोक का राजा बना देते हैं।

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