भारतीय महिलाओं का रंग बिंरगा पहनावा दुनिया भर में काफी लोकप्रिय है

भारत में यदि आप ऐसी जगह पहुँच जायें जहाँ दो चार सौ लोग जमा हों, जैसे पहले मेले इत्यादि में हुआ करते थे तो अनगिनत स्त्रियों में से किन्ही दो के कपड़ों में भी समानता नहीं पायेंगे। यदि चार स्त्रियों ने यदि नीली साड़ी पहन रखी है तो चारों का डिज़ाइन, शेड और रंग संयोजन अलग होगा।

और शादी ब्याह में तो कहना ही क्या?

देश देश न घूमें हों, चित्रों और फ़िल्मों में तो सब देशों का पहनावा देखा ही है। और मैं बेझिझक कह सकती हूँ कि भारतीय महिलाओं का पहनावा ही सबसे सुन्दर है।

राजस्थान मरू भूमि था। दूर तक फैली रेत, चहुँ ओर रेत के टीले। पर वहाँ के लोगों ने वहाँ ऐसे चटक कपड़े पहने- स्त्रियों के लहँगों से लेकर पुरुषों की पगड़ी तक- कि वही राजस्थान आज ‘रंग रंगीला’ कहलाता है

दुल्हन का लहँगा। क्या आश्चर्य कि विदेशी स्त्रियाँ हमारे कपड़ों पर मोहित हो जाती हैं। भारतीय पोशाकों में जितनी विभिन्नताएँ है वह कहीं नहीं। विशाल भारत का हर प्रान्त के भोजन की तरह ही अपने पहनावे में विविधता लिए है।

दूसरी बात यह है कि विश्व के उन देशों में जहाँ का मौसम शीत और अति शीत के आसपास घूमता है वहाँ स्वयं को हर समय मोटे ऊनी वस्त्रों से ढक कर रखना पड़ता है और आपकी पोशाक कम ही दिखाई देती है। इसके विपरीत भारत के अधिकांश क्षेत्रों में खुला मौसम रहता है और मन पसन्द कपड़े पहने जा सकते हैं।

हर प्रांत का पहनावा अलग है। सिर्फ़ सिलाई में ही नहीं, कपड़े की बुनावट में भी। साड़ी एक है परन्तु विभिन्न प्रान्तों में उसे बाँधने के तरीक़े अलग हैं। गुजराती, बंगाली, महाराष्ट्रियन, और दक्षिण भारत में ही अनेक प्रकार। कपड़े की बुनावट में भी फ़र्क़ है। कोटा की साड़ियों की बुनावट कुछ इस तरह की जैसे हवादार कपड़ा। हथ करघे पर बुनी हुई हर साड़ी अपने में अनूठी होती है।

काश्मीरी काफतान, पंजाबी सूट, राजस्थान में लहँगा- पहले सब प्रांतों के पहनावे अपने अलग अलग हुआ करते थे। अब बड़े चाव से दूसरे प्रांत का पहनावा अपना लिया जाता है।

दक्षिण भारत में पंजाब का सलवार सूट आम हो गया है। और पंजाब की दुल्हनें अपने ब्याह पर लहँगे पहनने लगी हैं।

सलवार सूट का प्रचलन पंजाब से शुरु हुआ और आरामदायक होने के साथ साथ, पूरा बदन ढका होने के कारण, फ़ैशनेबल एवं पारम्परिक दोनों घरों में चलता है। आप जितने भी सूट देखेंगे हर सूट दूसरे से भिन्न होगा, इतनी विविधता है इनमें।

लखनऊ के चिकनकारी वाले कुर्ते भी सलवार, चूड़ीदार के साथ पहने जा सकते हैं। ढीले कुर्ते बिना दुपट्टे के पहन लो तो पश्चिमी पहनावे की तरह, इनमें भी भाग दौड़ की जा सकती है। और देखने में उससे कई गुना सुन्दर। क्योंकि पैँट, जीन्स में रंगों का प्रयोग एक सीमा तक ही किए जा सकता है।

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