पाकिस्तान में हिंदू अपना अंतिम संस्कार कहाँ करते हैं? जानिए आप भी इसके बारे में

ये अपने आप में एक आश्चर्य की बात है और दुःख की बात भी है कि पाकिस्तान में 80 प्रतिशत हिंदू शवों को दफ़नाते है ।वे उनका दाह संस्कार नहीं करते हैं।ये कराची का एक 100 साल से भी ज्यादा पुराना 22 एकड़ में फैला हिंदुओं का श्मशान घाट है।

जहाँ हिंदू शवों को दफ़नातें हैं लेकिन शवों को दफनाने का तरीका मुसलमानों से अलग है ।पहले वो शव का थोड़ा सा हिस्सा जलाते है जैसे पैर या हाथ का और फिर शव को कमल की पोजीशन में बिठा कर दफ़नाते हैं।गड्ढे का आकार भी आयताकार न हो कर गोल होता है।और कब्र भी ऊपर से शंकु के आकार की होती है।[2]

वहाँ हिन्दू शवों को क्यों दफ़नाते हैं? इसके पीछे क्या कारण है चलिए तलाश करते हैं—

रिवाज

  • पाकिस्तान में करीब 7 मिलियन हिन्दू रहते हैं (ये संख्या भी काफ़ी विवादित है पाकिस्तान हिंदू काउन्सिल का दावा है ये संख्या 8 मिलीयन है और 1998 की जनगणना के अनुसार 2.4 मिलीयन है।[3] ) उनमें से ज्यादातर सिंध(ये पाकिस्तान का दूसरा सबसे बड़ा प्रांत है और इसकी सीमा गुजरात और राजस्थान से मिलती है) के दक्षिण भाग में रहते हैं।ये थार रेगिस्तान का क्षेत्र है।साल 1899 में यहाँ भयंकर सूखा पड़ा था और पेट भरने तक के लाले पड़ गए थे। तबसे वहाँ हिंदुओं ने शवों को दफनाना शुरू कर दिया और ये प्रथा आज तक जारी है

ग़रीबी

  • पाकिस्तान में ज्यादातर हिंदू दलित समुदाय से हैं जो काफी गरीब हैं।दाह संस्कार में करीब 8 से 15 हजार तक का ख़र्चा आ जाता है जो वे वहन नहीं कर सकते।और ये तो तब है जब श्मशान घाट घर के नजदीक है।अगर दूर है या दूसरे शहर में है तो ट्रांसपोर्ट का खर्चा अलग से ।

हिंदू श्मशान घाटों की कमी

  • पाकिस्तान में हिंदुओं के लिए श्मशान घाटों की संख्या बहुत कम है।अगर हम कराची जैसे बड़े शहर की बात करे तो वहाँ 250000 हिंदुओं के लिए सिर्फ़ एक श्मशान घाट है वो भी आज़ादी से पहले का बना हुआ।
  • कुछ स्थानों पर तो अंतिम संस्कार करने के लिए सैकड़ों किलोमीटर की यात्रा करनी पड़ती है।
  • लाहौर में देश की आज़ादी से पहले 12 श्मशान घाट थे अब वहाँ एक भी नहीं है।1947 में क़रीब 1200 हिंदू परिवार वहाँ रहते थे ।धीरे धीरे सब दूसरी जगह चले गए और अब सिर्फ़ 6 परिवार रहते हैं।

“In Lahore alone, there were about 12 cremation grounds before Independence. But not even a single facility exists at present. After Independence, there were 1,200 Hindu families living in Lahore which now has come down to six families,” [6]

  • अगर इस्लामाबाद के बात करे तो वहाँ भी कोई शमशान घाट नहीं है ।वहाँ क़रीब 158 हिंदू परिवार रहते हैं लेकिन उनको अंतिम संस्कार के लिए सिंध जाना पड़ता है।
  • ख़ैबर्पख्तूनख्वा में भी ठीक ठाक संख्या में हिन्दू है लेकिन वहाँ भी श्मशान घाट ना के बराबर है।कोहाट में एक है।मरदान और बुनेर में एक एक श्मशान घाट है।एक श्मशान घाट आटोक नदी(ये सिंधु नदी की सहायक नदी है) के पास है।लेकिन वहाँ तक पहुँचने की हिम्मत बहुत कम लोग ही कर पाते हैं।पेशावर से आटोक नदी तक की यात्रा पर 15000 रुपये का खर्च आता है और दाह संस्कार का पूरा खर्चा 40000 के आसपास आता है।और ज्यादातर हिन्दू तो ग़रीबी की रेखा से नीचे रहते हैं।[8]
  • गरीबी इस कदर है कि ज्यादातर हिंदुओं को ना चाहते हुए भी शवों को आसपास की कब्रगाह में दफनाना पड़ता है।बन्नु, हंगू, डेरा इस्माइल खान और मलकन्द में काफी हिन्दू ये ही कर रहे है।अपने आप को संतुष्ट करने के लिए एक सिक्के को जलाकर शव की हथेली पर निशान बना देते हैं।

राजनीति

अगर हिंदुओ को किसी तरह श्मशान घाट बनाने के लिए जमीन आबंटित भी हो जाती है तो वहाँ के स्थानीय निवासी उसका विरोध करने लगते है कि ये लोग तो वातावरण खराब कर देंगे।दुर्गन्ध फैल जाएगी।पेशावर के एमपीए (जैसे हमारे यहाँ एमएलए होते हैं) सरदार सोरन सिंह कहते हैं-

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