क्या सच में स्मार्ट फ़ोन के उपयोग से कैंसर हो जाता है?

अगर मोबाइल से कैंसर हो सकता होता तो सबसे पहले डायनासोर कैसंर से मरते! और इस धरती पर जीवन कभी पनप ही ना पाता।

क्या हुआ सोच में पड गये? आप सोच रहे होगें कि क्या डायनासोर मोबाइल का इस्तेमाल करते थे जो वह उसके प्रभाव से मरते?

मोबाइल से कैंसर होने की अफवाह सबसे अधिक फैली हुई और सबसे अधिक मानी जानी अफवाह हैं जहाँ तक की जी न्युज का प्रसिद्ध शो डीएनए भी एक पुरा ऐपीसोड इस पर दिखा चुका है कि कैसे कैसे मनुष्य को यह मोबाइल डिवाइस कैसंर से ग्रस्त कर देता हैं।

मैं पहले आपको वो बाते बताता हूँ जिसके अनुसार लोगो कहते है कि मोबाइल डिवाइस से कैसंर हो जाता हैं

  • मोबाइल से खतरनाक रेडिएशन निकलता है और जब हम मोबाइल से बात करते हैं तो वह रेडिएशन हमारे मस्तिष्क को प्रभावित करता है जिससे हमारे दिमाग में ब्रैन टुमर पैदा हो जाता हैं
  • मोबाइल के टावर से खतरनाक रेडिएशन निकलने कि वजह से यह हमें कैसंर रोग से प्रभावित करता हैं
  • ज्यादा देर मोबाइल रेडिएशन के सम्पर्क में रहने से हमे तरह तरह के रोग होने कि सम्भावना बढ जाती हैं

हिटलर ने कहा था कि लोगों को झुठ पर भरोसा दिखाना है तो उसे सच कि तरह बताओं।

अब मैं बताता हूँ कि क्यों मोबाइल से कैसंर होना एक झुठी थ्योरी हैं

1. मोबाइल से निकलने वाले जिस खतरनाक रेडिएशन कि लोग बात करते हैं वो खतरनाक रेडिएशन असल में रेडियो तंरगें हैं और ये रेडियो तरंगे हमेशा से हमारे आस पास मौजद रहती हैं तब से जब से मानव इस धरती पर आया, मोबाइल तो चंद रोज पहले आये पर रेडियो, रेडियो तो 70 साल पुरानी है मोबाइल और रेडियो एक ही प्रकार के तंरगों का उपयोग करते हैं तो अगर मोबाइल से कैसंर होता है तो रेडियो से भी होना चाहिये? रेडियो को भी गोली मारीये, जो रेडियो तरंगें हमारे ग्रह पर सौरमंडल से आती है उन का क्या? ये तंरगे धरती पर सदैव आती रही है और आती रहेगीं, क्योंकि ये एक प्राकृतिक घटनाक्रम है जो हमारे बस के बहार हैं आज तक के मानव इतिहास में एक भी इन्सान कि मौत इन रेडियो तंरगों से नहीं हुई हैं। क्योंकि मोबाइल भी रेडियो तरंगो पर काम करता है इस लिऐ मोबाइल भी कभी कैसंर का कारण नहीं बन सकता।

2. मोबाइल टावरों से होनी वाली पंक्षियों कि मौते के पीछे भी रेडिएशन का हाथ होने वाली थ्योरी बकवास हैं पक्षी इस लिऐ टावरों पर अपना घोसला नहीं बनाते क्योंकि टावर कि संरचना ना तो पेड कि तरह होती है और न ही चट्टानों कि दरारों कि तरह, टावर न तो पक्षियों को आन्धी तुफान से रक्षा दे पाते है और न ही बारिश से दुसरी और टावर क्योंकि धातु के बने होते है इस लिऐ उनमें कम्पन बहुत होता हैं जो पक्षी कभी पसन्द नहीं करते। पक्षीयों के अन्दर दिमाग होता है भाई; वो कहीं भी अपना खोसला नहीं बना लेगें केवल इन्सान ही बुद्धिमान नहीं। समझो इस बात को।

3. लोग कहते है कि वैज्ञानिक सर्वों मे पाया गाया है कि यें मोबाइल रेडिएशन कैसंर का कारण हैं? पर क्या आप को उन्होंने बताया कि कौन सा वैज्ञानिक परिक्षण? और ये परिक्षण किया किस विज्ञानिक ने?

मोबाइल संचरन कि तकनीक को विभिन्न अन्तराष्ट्रीय समुदायों द्वारा मानव प्रयोग के लिऐ सुरक्षित घोषित किया गाया हैं और जहाँ तक कि बात हैं मानव के ऊपर रेडिएशन के पडने वाले असर के बारे में तो ऐसा अध्ययन करना असम्भव हैं क्यों? क्योंकि अगर वैज्ञानिक मोबाइल रेडिएशन का मानव पर अध्ययन करने लगें तो उन्हें सबसे पहले उन इन्सानों को प्राकृतिक रेडिएशन से दुर करना होगा जो कि असम्भव है क्योंकि यह हर जगह फैला हैं

दुसरी बात ऐसे कम से कम 10,000 लोगों पर 10-15 साल तक निगरानी रखनी होगी जो कि दुसरी असम्भव बात हैं।

दोनों बाते बताने के लिऐ काफी है कि मोबाइल रेडियेशन से मानव जीवन को खतरें से जुडे हुये ना तो आज तक कोई प्रयोग हुये है और ना कभी हो सकते हैं? और जो लोग ये दावा करते है कि उन्होंने ऐसा प्रयोग किया है या ऐसे प्रयोग के बारे में पढा है वो या तो स्वयं मुर्ख है या फिर आप को मुर्ख बना रहा है

आप कह सकते है कि यदि ऐसा है तो मोबाइल से निकलने वाले रेडिएशन कि एक सिमा क्यों तय कि गयी हैं?

अगर मोबाइल कम्पनीयों को यह छुट होती कि वे जितना चाहे अधिक से अधिक रेडिएशन का प्रयोग फोन में करें तो इससे आप कि मोबाइल कि बैट्ररी लाइफ बहुत कम होती और आप ज्यादा ऊर्जा खपत करते, शायद आप को ज्ञात न हो पर भारत में फ्रिज और वोशिगं मशीन कि मोटर कि भी एक अधिकतम हैं जिससे अधिक ताकतवर वे नहीं हो सकती।

ऐसा होता है कि रेडिएशन मनुष्य के शरीर में इतना गहरा कोई प्रभाव नहीं छोडता और अगर थोडा बहुत छोडता भी है तो नगण्य हैं क्योंकि मनुष्य का शरीर कि माँसपेशियाँ चुम्बकीय धुव्र लिये हुये होता हैं और वह प्रतिक्रिया देगा ही, लेकिन यह समान्य हैं।

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