एक तरबूज के फल के लिए राजस्थान की 2 रियासतों में हुआ भयंकर युद्ध, इतिहास में ” मतीरे की राड़ ” के नाम से दर्ज है यह युद्ध

विश्व का इतिहास ऐसे कई युद्धों से भरा पड़ा है जिसमें कोई स्वतंत्रता के लिए लड़ा गया तो कोई अपने देश की रक्षा के लिए लड़ा गया तथा कई युद्ध ऐसे भी है जो बदले की भावना के साथ लड़े गए ।
इतिहास में कई हास्यास्पद युद्ध ऐसे भी है जो मानव की मूर्खता के कारण लड़े गए। ऐसा ही एक युद्ध राजस्थान की 2 रियासतों के बीच हुआ और आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि यह युद्ध केवल एक तरबूज के फल के लिए लड़ा गया। इतिहास में इस युद्ध को ” मतीरे की राड़ ” के नाम से जाना जाता है “मतीरा” अर्थात तरबूज, “राड़” अर्थात लड़ाई यह मारवाड़ी भाषा के शब्द है।

राजस्थान वीरों की धरती है इस मरुभूमि ने भारत को कई वीर, बहादुर एवं शूरवीर योद्धा प्रदान किए हैं। महाराणा प्रताप, वीर दुर्गादास, भामाशाह आदि कुछ महापुरुषों के अलावा और भी कई अनगिनत वीर सपूत है जो अपनी वीरता से अनेकों लड़ाइयां लड़ कर इतिहास में अमर हो गए।

यह बात 1644 ईस्वी की है बीकानेर और नागौर दोनों अलग-अलग रियासतें हुआ करती थी बीकानेर की रियासत के राजा महाराज करण सिंह थे तथा नागौर रियासत का शासन राव अमरसिंह करते थे। ये दोनों राजा मुगलों के अधीन अपना राजपाट चलाते थे। क्योंकि इन्होंने दिल्ली सल्तनत का आधिपत्य स्वीकार कर लिया था दिल्ली की सल्तनत की बागडोर उस वक्त शाहजहां के पास थी।

इस लड़ाई की शुरुआत होती है बीकानेर रियासत के सिलवा गांव तथा नागौर रियासत के जाखनिया गांव से यह दोनों गांव अपने-अपने रियासतों के अंतिम गांव थे तथा इनकी एक दूसरे के साथ सीमाएं लगती थी। एक खेत नागौर रियासत में था उसके पास का ही एक खेत बीकानेर रियासत में था और बीकानेर रियासत के एक किसान ने एक तरबूज की बेल अपने खेत में उगाई, जो कि बाद में खेत की सीमा पार करके पास के खेत में फैल गई जो की नागौर रियासत में आता था, और वहां उसके ऊपर एक तरबूज का फल लगा। अब समस्या यह हो गई कि दोनों ही रियासतों के किसान इस पर अपना दावा करने लगे एक का कहना था कि बेल उसके खेत में लगी है इसलिए फल उसका है। दूसरे का कहना था कि फल उसके खेत में लगा है इसलिए फल पर अधिकार उसका है। इस समस्या का कोई रास्ता ना निकालता देख दोनों अपने-अपने राज दरबार में पहुंचे और यहीं से इस हास्यास्पद युद्ध की शुरुआत हुई।

नागौर के शासक राव अमरसिंह
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उस वक्त नागौर के शासक राव अमरसिंह अपनी रियासत में ही मौजूद थे जबकि बीकानेर के शासक करण सिंह मुगलों के लिए दक्षिण अभियान पर (युद्ध के लिए) गए हुए थे। दोनों रियासतों के बीच “मतीरे (तरबूज)” को लेकर झगड़ा हुआ बाद में इसने युद्ध का रूप ले लिया। नागौर की और से सेना की कमान संभाले हुए थे सिंघवी सुखमल तथा बीकानेर की सेना की कमान रामचंद्र मुखिया के पास थी जैसा की ज्ञात है ये दोनों रियासते, मुगलिया सल्तनत की अधीनता स्वीकार कर चुकी थी इस कारण दोनों राजाओं ने दिल्ली सल्तनत को मदद की गुहार लगाई राव अमरसिंह ने आगरा लौटने पर बादशाह को इसकी शिकायत की। तो करण सिंह ने सलावत खा बक्शी को पत्र लिखकर बीकानेर की पैरवी करने का आग्रह किया लेकिन यह मामला मुगल दरबार में चलता, उससे पहले ही यह युद्ध हो गया और इसमें नागौर की हार हुई तथा बीकानेर की सेना विजयी हुई और हजारों सैनिकों की शहादत के बाद यह “मतीरा” बीकानेर रियासत को खाने के लिए मिला। यह युद्ध इतिहास में ” मतीरे की राड़ ” के नाम से दर्ज है

बीकानेर के शासक करण सिंह
इस प्रकरण से मुगल बादशाह शाहजहां बहुत नाराज हुआ क्योंकि उसकी इच्छा थी कि दोनों राजा साथ रहकर काम करें और उन्हें युद्ध ना करते हुए इसका विवाद का समाधान निकालना चाहिए था।
इसके कारण नागौर के राज अमर सिंह और शाहजहां के बीच मतभेद होने लगे और उनके बीच ही आंतरिक संघर्ष होने लगा।
एक बार राव अमरसिंह पर दरबार में अनुपस्थिति का जुर्माना लगा दिया गया और शाहजहां ने अपने साले सलावत खान से दरबार में उपस्थित अमर सिंह से जुर्माना वसूलने का आदेश दिया। यह अपमान अमर सिंह को बुरा लगा और जैसे ही सलामत खा उनके पास पहुंचा अमर सिंह ने तलवार के वार से उसको मौत के घाट उतार दिया।

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