अंग्रेजो के 1200 क़ानून जो आज भी गुलामी की निशानियों के रूप में मौजूद हैं

कहते है कि “मानसिक गुलामी, शारीरिक गुलामी से ज्यादा भयावह होती है, क्योंकि शारीरिक गुलामी से केवल एक पीढ़ी… जबकि मानसिक गुलामी से कई पीढियां खत्म हो जाती है।”

हमारा देश ‘भारत’ ऋषियों, मुनियो, संतो, त्यागियों, तपस्वियों, राजाओ, महाराजाओ, श्रेष्ठ वीरो-वीरांगनाओ, क्रांतिकारियों, महापुरुषों तथा समाज को दिशा देने वाले पथ प्रदर्शकों का देश है। इस भूमि के कण-कण में राम-कृष्ण की कहानियां बसती है, इस भूमि का श्रेष्ठ इतिहास है जो हमे अन्य देशों से अलग बनाता है। जब विश्व की अन्य संस्कृतियो का प्रादुर्भाव भी नही हुआ था तब भारतीय संस्कृति को लेकर हमारे ऋषि मुनि जग को दिशा दिया करते थे, हम अन्य से श्रेष्ठ थे और अन्य लोग हमारे यहां शिक्षा ग्रहण करने आया करते थे। हर किसी को अपने में मिला लेना, उसे सहजता से अपना लेना और सबकुछ बता देना ये हमारी संस्कृती का हिस्सा था, परन्तु हमारा यही भाव धीरे-धीरे हमारे लिए पीड़ा का विषय बन गया। हमे विदेशी आक्रांताओ ने लंबे समय तक गुलाम बनाये रखा। मुगलो के राज्य के समय व्यापार की दृष्टि से आये अंग्रेजो ने घुम-घुमकर भारतीय समाज में व्याप्त छोटी-छोटी बुराइयों का ध्यान किया और उनको सुलझाने की मंशा समाज को बताते बताते, हम पर राज करने लगे, हमारी संस्कृति का ह्रास करने लगे। मुगलो ने इस देश में शारीरिक प्रताड़ना दी, लेकिन अंग्रेजो ने मानसिक रूप से समाज को बदला।

यह कार्य अंग्रेजो ने इस देश के नित नए कानून बनाकर किया। मैकाले ने हमारे गुरुकुल खत्म करवा करके कॉन्वेंट प्रारम्भ किये ताकि भारत से अंग्रेजो का राज खत्म होने पर भी शरीर से भारतीय पर दिलो-दिमाग से अंग्रेज हमेशा मौजूद रहे। हमें आजाद हुए, देश से अंग्रेजो को गये 70 साल हो गए, 15 अगस्त 1947 को भारत ने टुकड़ो में आजादी पाई थी और अंग्रेज इस देश को छोड़कर चले गए थे परंतु यहां छोड़ गए कई सारे कानून, कई प्रतिक चिन्ह, कई प्रतिमाये जिन्हें हम आज भी सहेजे हुए है और जिन्हें हम आज भी मानते आ रहे है। 1946 में महात्मा गांधी ने कहा था कि “1947 के बाद अंग्रेज चाहे तो मेहमान बनकर इस देश में रहे परन्तु अंग्रेजियत भारत से खत्म होना चाहिए। कोई भी आजाद मुल्क ग़ुलामी की निशानियों को रखकर जनता में स्वाभिमान का जागरण नही कर सकता।

देश की आजादी के बाद देश ने कई बदलाव देखे। हम फर्श से अर्श तक पंहुचे, हम बैलगाड़ी में विमानवाहक से 104 उपग्रहों तक पहुँचे, हम यान से मंगल पर पहुँचे, पर नही पहुँच पाये तो जनता के दिलो तक। कई सरकारे आई और चली गई, पर कोई भी जनता में स्वाभिमान पैदा नही कर पाया, यह देश मेरा भी देश है, इसका अच्छा-बुरा मेरा भी अच्छा-बुरा है इस भाव का बीजारोपण कोई नही कर पाया। हमारा देश अंग्रेजो द्वारा प्रदत्त ऐसी कई निशानियो को अपने सिर पर लेकर आगे बढ़ रहा है, जो हर भारतीय के लिए शर्मनाक है।

कुछ का उल्लेख नीचे है-

1. मुम्बई का छत्रपति शिवाजी टर्मिनस जो पूर्व में विक्टोरिया टर्मिनस था। देश की आजादी के 50 वर्षों के बाद 1996 में इसका नाम बदला और विक्टोरिया टर्मिनस से छत्रपति शिवाजी टर्मिनस हुआ, परन्तु आज भी वहाँ भारत के राष्ट्रध्वज से ऊपर अंग्रेजो की महारानी विक्टोरिया की प्रतिमा लगी हुई है।

2. अंग्रेज अधिकारी लेंसडाउन के नाम पर बसा है उत्तराखंड जैसे देवभूमि पर एक शहर (ये वही अधिकारी है जो हिन्दुओ को मुसलमानों और मुसलमानों को हिन्दूओ के प्रति भड़काने का काम करता था 1897 में पहला हिन्दू-मुस्लिम के नाम पर हुआ था दंगा).

3. हिमाचल प्रदेश के चम्भा जिले में बसा है अंग्रेज अधिकारी डलहौजी के नाम से शहर (ये वही अधिकारी है जो की देश का बेशकीमती कोहिनूर हीरे को लूट कर ले गया था जिसने देश के किसानो का उत्पीडन किया)

4. हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला जिले में मैकलौड गंज नाम से बसा है शहर ( ये शहर अंग्रेज अधिकारी मैकलौड के नाम पर है ये सेना का अत्याचारी अधिकारी था )

5. गोवा में वास्कोडिगामा के नाम पर बसा है शहर (ये पहला पुर्तगाली लुटेरा है जो की 20 मई 1498 को भारत को लूटने के लिए आया था)

6. लौरेंस रोड, अल्गिन ब्रिज, म्योर रोड, एल्फिन्स्टन रोड, कर्जन बिल्डिंग जैसे देश भर में कई सड़के, कॉलेज, हॉस्पिटल और मूर्तियां आज भी मौजूद हैं।

उपरोक्त उदाहरणों के अलावा देश की राजधानी दिल्ली में ही कई अंग्रेजों की मूर्तियाँ आज भी लगी हुई हैं, इसके अलावा बाबर-जहाँगीर-औरंगजेब-शाहजहाँ-बहादुरशाह जैसे अनेक मुग़ल बादशाहों के नाम पर सड़कें और संस्थान बने हुए हैं, जो देश के स्वाभिमान को ठेस पहुँचाते हैं. अहमदाबाद-फरीदाबाद-इलाहाबाद-तुगलकाबाद-औरंगाबाद जैसे कई शहरों में से कुछ के नाम बदले जाने हैं, कुछ के बदल चुके हैं… लेकिन गुलामी की मानसिकता हमारे मन में इतनी गहरी घुसी बैठी है कि अभी भी हम इन शहरों को आम बोलचाल की भाषा में काशी, कर्णावती, संभाजीनगर आदि नहीं पुकारते.

इन चिन्हों, प्रतिमाओं आदि निशानियों के साथ कुछ निशानियां ऐसी भी है, जिनके बारे में हमारे देश की जनता को जानकारी नही है, उस निशानी को सारा विश्व प्रतिदिन देखता है और तब जिसको जानकारी है उस भारतीय का सिर शर्म से झुक जाता होगा।। क्या आपमें से किसी को पता है कि भारत की सभी हवाई जहाजों की बॉडी पर VT से शुरू होने वाला शब्द क्यों लिखा रहता है??? यह VT भारत का कोड है जो की इंटरनेशनल सिविल एविएशन ऑर्गनाइजेशन (ICAO) ने 1929 में अर्थात देश की आजादी के पूर्व दिया था।। प्रत्येक देश के हवाई जहाजों के ऊपर 5 अक्षर का एक कोड होता है, जो ICAO जारी करता है, जिसमे प्रथम 2 अक्षर देश तथा बाद के अक्षर उस हवाई जहाज के मालिकाना हक वाली कंपनी का कोड होता है। भारत का कोड VT है, जिसका अर्थ हमारे तथा देश के लिये शर्मनाक है। 

VT का मतलब होता है “VICEROY TERRITORY” यानी वाइसराय का इलाका। 88 साल से चले आ रहे इस VT को 70 साल का आजाद भारत आज तक बदल नही पाया। कहने को आजादी 1947 में पा ली परन्तु विमान सेवाओं में आज भी हम वाइसराय के अर्थात अंग्रेजो के इलाके में रहते है, गुलामी की जंजीरों में आज भी जकडे हुए है। इस सम्बन्ध में भाजपा संसद तरुण विजय ने मई 2016 में यह मांग रखी थी कि भारत सरकार हवाई जहाज़ों के रजिस्ट्रेशन से यह गुलामी वाला कोड VT हटाए, लेकिन अभी तक कुछ हुआ नहीं है. इस मामले में चीन से हमें सबक सीखना चाहिए, जैसे ही हांगकांग ब्रिटिश नियंत्रण से मुक्त होकर चीन के कब्जे में आया, वैसे ही वहाँ के एयरलाईनों के रजिस्ट्रेशन का नंबर VR-H से बदलकर B-H कर दिया गया है. यहाँ तक कि पाकिस्तान भी इस मामले में हमसे आगे निकला… उसने भी भारत से अलग होने के बाद अपना रजिस्ट्रेशन कोड AP रखा है… केवल भारत ही ऐसा देश है जो IN की बजाय आज भी “वाइसराय टेरिटरी” यानी VT को अपनी छाती से चिपकाए घूम रहा है. जब फ्रांस के लिए कोड F है, जापान के लिए JA है, तो भारत के लिए IN कोड क्यों नहीं होना चाहिए?

केंद्र की मोदी सरकार ने पहल करके देश में लागू कुछ अंग्रेजी कानूनों में बदलाव किये है, जिनमे छोटे बड़े मिलकर 1200 कानून है तथा और भी’ बदलाव भविष्य में होंगे। सरकार को चाहिए की वर्षों से चले आ रहे इन गुलामी के प्रतीक चिन्हों, मूर्तियों, कानूनों आदि को ख़त्म करें और भारत को मानसिक गुलामी की दासता से मुक्त करें, ताकि देश की जनता में स्वाभिमान का भाव पैदा हो सके।

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