ये है बिल्ली की तीर्थ यात्रा, पढ़ें मजेदार कहानी

एक बिल्ली थी। वह रोज एक अहीर के घर जाती और जब घर मे कोई नहीं रहता है तो वह कुठले में घुसकर मटकी में से घी चुराकर खा जाती थी।

लेकिन एक अहीर ने बिल्ली को घी खाते हुए देख लिया हुआ और वह उसे मारने के लिए दौड़ा। बिल्ली का मुंह और सिर मटके में था। बिल्ली को डर लगा तो वह एकदम दौड़ी। लेकिन मटकी में से अपना सिर जल्दी से निकाल नहीं इसलिए मटकी उसकी सिर में लटकी रही। दौड़ती दौड़ती बिल्ली एक खम्बे से टकराती है। मटकी तो फुट जाती है, लेकिन उसकी घघरी बिल्ली के गले मे लटकी रहती है। बिल्ली गले मे घघरी पहने आगे बढ़ती है और उसे रास्ते मे कबूतर मिलता है।

कबूतरों ने पूछा – बिल्ली बहन, बिल्ली बहन! कहां जा रही हो।

बिल्ली ने कहा – तीरथ करने जा रही हूं।

कबूतरों ने पूछा – गले मे क्या पहनें हो।

बिल्ली ने कहा – ये तो माला है।

कबूतरों ने कहा – हम भी चले तुम्हारे साथ तीर्थ यात्रा करने।

बिल्ली ने कहा – चलो, जरूर चलो। तीरथ करने से तुम्हे भी पूण्य मिलेगा।

कबूतरों ने पूछा – हमे मारकर तो नहीं खाओगे।

बिल्ली ने कहा – नहीं, नहीं। मैं तुम्हे मारकर कैसे खा सकती हूं, मैं तो भगतिन बन गई हूं। देखो न मेरे गले में यह माला है और मैं तीरथकरने निकली हूं।

फिर कबूतर बिल्ली बाई के साथ जाने लगती है।

रास्ते मे चूहा मिलता है। चूहा बैठा बैठा डुग्गी बजा रहा था। उसने पूछा, बिल्ली बहन, बिल्ली बहन कहां जा रही हो।

बिल्ली ने कहा – तीरथ जा रही हूं।

चूहा ने पूछा – गले मे क्या पहनें हो।

बिल्ली ने कहा – ये तो माला है।

चूहा ने कहा – हम भी चले तुम्हारे साथ तीर्थ यात्रा करने।

बिल्ली ने कहा – चलो, जरूर चलो। तीरथ करने से तुम्हे भी पूण्य मिलेगा।

चूहा ने पूछा – मुझे मारकर तो नहीं खाओगे।

बिल्ली ने कहा – नहीं भैया जी। मैं अब किसी को कैसे मारकर खा सकती हूं, मैं तो भगतिन बन गई हूं। देखो न मेरे गले में यह माला है और मैं तीरथ करने जा रही हूं।

फिर चूहा भी बिल्ली के साथ तीरथ करने करने चल पड़ता है।

अब आगे रास्ते मे बिल्ली को एक मोर मिलता है।

मोर ने पूछा, बिल्ली बहन, बिल्ली बहन कहां जा रही हो।

बिल्ली ने कहा – तीरथ जा रही हूं।

मोर ने पूछा – गले मे क्या पहनें हो।

बिल्ली ने कहा – ये तो माला है।

मोर ने कहा – हम भी चले तुम्हारे साथ तीर्थ यात्रा करने।

बिल्ली ने कहा – चलो, जरूर चलो। तीरथ करने से तुम्हे भी पूण्य मिलेगा।

मोर ने पूछा – मुझे मारकर तो नहीं खाओगे।

बिल्ली ने कहा – नहीं भैया जी। मैं अब किसी को कैसे मारकर खा सकती हूं, मैं तो भगतिन बन गई हूं। देखो न मेरे गले में यह माला है और मैं तीरथ करने जा रही हूं।

फिर मोर भी बिल्ली के साथ यात्रा करने चल पड़ता है।

अब बिल्ली, कबूतर, चूहा और मोर साथ-साथ यात्रा करने लगते हैं। और चलते चलते भगवान शंकर के एक मंदिर के पास पहुंचे। शाम बहुत हो चुकी थी इसलिए वे मन्दिर में ही ठहर गए।

कबूतर, चूहा और मोर रास्ते भर दाना चुगती चुगती आये थे तो उनका पेट भर गया था। लेकिन बिल्ली बाई तो भूखी ही रह गई थी। वह तो भगतिन बन गई थी इसलिए कुछ खाती भी कैसे।

तब भूखी बिल्ली ने अपने साथियों को खाने की बात सोची। उसने सभी से कहा, तुम सब मन्दिर में सो जाओ मैं बाहर सोऊंगी और पहरा दूंगी। उसने सोचा था कि सभी सो जाएंगे तो मैं उन्हें मारकर खा जाउंगी।

आधी रात हो गई। बिल्ली ने सोचा कि अब तो रात हो गई है और सभी सो गए होंगे, अब मैं उन्हें खा सकती हूं।

वह धीमे पैर से मन्दिर में गई तो देखा कि सभी जाग रहे हैं। सभी के मन मे बिल्ली का डर तो था ही।

बाद में बिल्ली बाई ने कबूतर को कड़क कर पूछा तुम आंख किसे दिखा रही हो।

कबूतर घबरा गया और कहा – किसी को नहीं बिल्ली बहन।

फिर बिल्ली मोर के पहुँचती है और कहती है- तुम यह कलगी किस ओर लगाई हो।

मोर ने डरते डरते कहा- किसी ओर नहीं लगाई है, बिल्ली बहन।

और फिर बिल्ली के पास जाकर कहती है – तुम किसे देख कर अपनी मूंछों को ताव दे रहे हो।

चूहे ने कहा – मैं तो अपनी भगतिन बिल्ली को देखकर अपने मुछो को ताव दे रहा हूं।

बिल्ली को गुस्सा आ गया और वह चूहा को मारने दौड़ती है।

जैसे ही वह चूहा को मारने दौड़ी, चूहा दौड़कर मोरी में घुस गया। कबूतर उड़कर मन्दिर के शिखर पर बैठ गया और मोर भागकर मन्दिर के बाहर चली गई।

बिल्ली बाई अपना मुंह फाडे भूखी की भूखी खड़े रही।

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