यह प्राणी पूंछ से सांस लेता है! यह प्राणी विलुप्त होने की कगार पर है

“मैरी नदी का कछुआ”! वैज्ञानिक भाषा में इसे ( Elusor macrurus ) कहते हैं।

यह “कछुआ” दक्षिण पूर्व क्वींस लैंड, ऑस्ट्रेलिया में पाया जाता है। इस “कछुआ” की लंबाई 50 सेंटीमीटर तक दर्ज की गई है। यह लाल रंग, काले रंग, गुलाबी, हल्का नीला इत्यादि रंग में पाया जा सकता है।

इस कछुआ के सिर पर ‘हरे बाल’ होते हैं !
इन कछुओं की एक विशेषता, इनके सिर पर ‘हरे रंग’ के बाल होना होते है। जो कि, देखने में बेहद खूबसूरत और किसी ताज के समान महसूस होते हैं।

हालांकि, यह ओरिजिनल बाल नहीं होते। इनके सिर पर कुछ विशेष ग्रंथियों में ‘शैवाल’ उड़ने लगते हैं। यह ‘शैवाल’ बड़े होकर, घास का रूप ले लेते हैं। जो कि, इसके सिर पर उगे हुए ‘हरे बाललों’ की तरह दिखाई देते हैं। उगे हुए ‘बाल’ का लाभ इन्हें, छद्म आवरण प्रदान करता है। अन्य शिकारी जानवरों से बचने में मदद करता है। अतः इन्हें “हरे बाल वाला कछुआ” भी कहा जाता है।

यह कछुआ “पूंछ से सांस” लेता है !
इन कछुओं की सबसे असामान्य बात यह है की यह अपनी ‘पूंछ’ से सांस लेते हैं। इनकी ‘पूंछ’ पर, ‘सेलमन’ मौजूद होता है। जिसका उपयोग यह सैल्मन के माध्यम से पानी के भीतर की ‘ऑक्सीजन’ को और शोषित करने के लिए करते हैं। इनके इस सिस्टम को “बीमोडल श्वसन” कहते हैं ।

यह अन्य प्राणियों की तरह, हवा में भी सांस ले सकते हैं, इसके लिए उन्हें सतह पर आना होता है। परंतु, पानी में सांस लेने के लिए यह अपनी विशेष ‘पूंछ’ का प्रयोग करते हैं। यह प्रक्रिया सामान्यतः अन्य किसी जानवर में नहीं देखी जाती।

इनकी संख्या बेहद कम पाई जाती है। अतः उनकी विकास के बारे में अधिक जानकारी नहीं मिल पाती है। तथापि इनको व्यस्क होने में ही, लगभग 25 से 30 साल तक लग जाते हैं।

यह प्रजाति सर्वहारा अर्थात शाकाहारी और मांसाहारी प्रकृति की होती है। यह पौधों में शैवाल वनस्पति इत्यादि खाते हैं तथा अपने से छोटे अन्य जानवरों का शिकार भी करते हैं। 1960 के दशक तक ऑस्ट्रेलिया में यह एक पालतू जानवर के रूप में लोकप्रिय था।

2003 में कछुआ संरक्षण समिति द्वारा विश्व स्तर पर इस 125 सबसे दुर्लभ व लुप्त प्राय कछुओं की प्रजातियों में सूचीबद्ध किया गया है।

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