जानिए महिलाओं के स्वास्थ्य सुधार पर विशेष ध्यान देने की जरूरत क्यों?

संयुक्त राष्ट्र द्वारा जारी किए गए आंकड़ों के मुताबिक दुनिया की कुल आबादी का 49.6 प्रतिशत हिस्सा महिलाओं का है। साल 2011 में हेल्थ केयर वीमेन इंटरनेशनल जर्नल में प्रकाशित एक अध्ययन से पता चलता है कि दुनिया के श्रम विभाग में महिलाओं की दो-तिहाई हिस्सेदारी है, लेकिन इसके विपरीत उनकी आमदनी कुल आय की केवल 10 फीसद ही है। इस डेटा में घरेलू कामकाज में लगी महिलाओं को शामिल नहीं किया गया है।

दुनिया की आबादी का इतना बड़ा हिस्सा होने और विकास में महत्वपूर्ण योगदान देने के बावजूद महिलाओं को उस प्रकार से स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं मिल पाईं, जिनकी वे ​वास्तविक हकदार थीं। महिला और पुरुष व्यवहारिक और शारीरिक दृष्टि से अलग हैं। इसका अर्थ है कि महिलाओं की आवश्यकताओं को कई सामाजिक पहलुओं पर वन साइज फिट ऑल के आधार पर पूरा नहीं किया जा सकता है।

महिलाओं के स्वास्थ्य के मुद्दों को बेहतर तरीके से समझा जाना चाहिए, क्योंकि उनका अच्छा स्वास्थ्य (या इसकी कमी) मनुष्यों की अगली पीढ़ी के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। महिलाओं के स्वास्थ्य पर ध्यान देने की आवश्यकता है, खासकर तब जब पुरुषों से इतर महिलाओं को विशष रूप से कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है।

पुरुषों की तुलना में महिलाओं का स्वास्थ्य और उनकी आवश्यकताएं अलग होती हैं। मासिक धर्म, गर्भावस्था, प्रसव और रजोनिवृत्ति जैसे जैविक चरणों का अनुभव कर वह कई प्रकार की स्वास्थ्य चुनौतियों का सामना करती हैं। नीचे दी गई वह समस्याएं हैं, जिनका सामना अकेले महिलाओं को करना पड़ता है।

स्त्रीरोग संबंधी स्वास्थ्य समस्याएं जैसे अनियमित पीरियड्स, बैक्टीरियल वजिनोसिस, पीसीओएस, एंडोमेट्रियोसिस, एडिनोमायोसिस, यूटेराइन फाइब्रॉयड और वुल्वोडनिया जैसे विकार।
गर्भावस्था से संबंधित समस्याएं जैसे प्रसव के बाद की देखभाल, गर्भपात, समय से पहले बच्चे का जन्म, सिजेरियन सेक्शन, जन्म दोष, स्तनपान संबंधी समस्या और प्रसव के बाद अवसाद की अवस्था।
ओवेरियन कैंसर और सर्वाइकल कैंसर।
टर्नर सिंड्रोम और रेट्स सिंड्रोम जैसे विकार।
हिंसा जैसे महिला जननांग विकृति और शिशु हत्या।

महिला स्वास्थ्य के चुनौतीपूर्ण कारक –
भले ही दुनिया की आधी आबादी महिलाओं की हो, फिर भी भारत सहित कई देशों में उनके स्वास्थ्य के मुद्दों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जा रहा है। निम्न कारक इस स्थिति को उत्पन्न करने के लिए जिम्मेदार हैं।

सामाजिक-सांस्कृतिक कारण
विश्व के अधिकांश हिस्सों में पुरुषों की तुलना में महिलाओं को वह सामाजिक अधिकार नहीं मिल सके, जो मिलने चाहिए थे। इस लैंगिक असमानता ने महिलाओं की शिक्षा, आर्थिक, सामाजिक स्वतंत्रता और स्वास्थ्य सेवाओं को कमजोर बनाया है। दुनिया के कई हिस्सों में महिलाओं को अकेले यात्रा करने, स्वास्थ्य के लिए भी दूसरों पर आश्रित रहने, यहां तक कि परिवार नियोजन के मामले में भी अपने पक्ष को रखने का अधिकार नहीं है। समाज में लड़के को प्राथमिकता देने के चलते न केवल कन्या भ्रूण हत्या और शिशु हत्या बढ़ी है, साथ ही स्वच्छता, पोषण के मामले में महिलाएं आजीवन उपेक्षा का शिकार भी रही हैं।

आर्थिक कारक
यूनाइटेड नेशनंस वूमेन और विश्व बैंक द्वारा 2013 में जारी की गई एक रिपोर्ट के अनुसार दुनियाभर में गरीबी से जूझ रहे 767 मिलियन (76.7 करोड़) लोगों में एक बड़ा हिस्सा महिलाओं और बच्चों का है। गरीबी का सीधा असर स्वास्थ्य सेवाओं पर पड़ता है। इसके अतिरिक्त, 2011 में हेल्थ केयर वुमेन इंटरनेशनल जर्नल में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार, काम के घंटों में दुनिया में दो-तिहाई हिस्सेदारी रखने वाली महिलाएं आर्थिक रूप से कुल आय का सिर्फ 10 फीसदी ही कमाती हैं।

वैज्ञानिक और चिकित्सा अनुसंधान
2003 में जर्नल ऑफ क्लिनिकल इन्वेस्टिगेशन में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार चिकित्सा, उपचार और स्वास्थ्य संबंधी तकनीकों के आधुनिकीकरण के निर्धारण के लिए किए गए सर्वे में महिलाओं को कम आंका जाता है। ऐसे में महिलाओं के स्वास्थ्य के लिए जरूरी अवयव कहीं न कहीं रह जाते हैं।

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