हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन दवा की कीमत से लेकर असर तक, जानें इसके बारे में

दुनिया में फैली महामारी के बीच हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन दवा ने अमेरिका जैसे देशों को भी भारत से मदद मांगने को मजबूर कर दिया है। भारत इस दवा का बड़ा निर्यातक है। मांग बढ़ने के बाद भारत सरकार ने इसके निर्यात पर रोक लगा दी थी, लेकिन करीब 30 देशों द्वारा इस दवा की मांग के बाद सरकार ने भारत पर निर्भर देशों को दवा उपलब्ध कराने की बात कही है।

भारत में बड़े पैमाने पर इस दवा का उत्पादन होता है। मलेरिया और आर्थराइटिस जैसी बीमारियों में यह दवा बहुत ही असरदार साबित हुई है। अब दुनिया में चल रहे महामारी संक्रमण से लड़ने में भी इस दवा को बड़ी उम्मीद के साथ देखा जा रहा है। आइए, जानते हैं इस दवा के उत्पादन, कीमत और अन्य गुणों के बारे में।

क्या है ये दवा: यह मलेरिया रोकने की दवा है, जिसे रूमेटॉयड अर्थटाइटिस और ल्यूपस जैसी ऑटो-इम्यून बीमारियों के इलाज में भी इस्तेमाल किया जाता है। हालांकि इस बात का कोई साक्ष्य नहीं है कि यह कोविड-19 के इलाज में कारगर है, लेकिन इसका सकारात्मक असर हुआ है।

पिछले दिनों भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद ने इस महामारी के उपचार के लिए इस दवा के उपयोग का सुझाव दिया। इसके मुताबिक इस दवा का इस्तेमाल संक्रमित और संदिग्ध दोनों तरह के मरीजों के लिए किया जा सकता है। हालांकि स्वास्थ्य मंत्रालय ने चेतावनी दी है कि इस दवा का इस्तेमाल डॉक्टर के कहने पर ही किया जा सकता है।

इस दवा की उत्पादक कंपनियां: प्रमुख दवा कंपनियां जायडस कैडिला और आईपीसीए इस दवा का उत्पादन करती हैं, जिसे सरकार ने पर्याप्त मात्रा में उपलब्धता सुनिश्चित करने का निर्देश दिया है।

इन दो कंपनियों के अलावा सिप्ला, ल्यूपिन लिमिटेड, एमसीडब्ल्यू हेल्थकेयर ऑफ इंदौर, इंटास फार्मास्युटिकल्स, मैक्लीओड्स फार्माक्यूटिकल्स यह दवा बनाती हैं। दवा बनाने के लिए एपीआई यानी एक्टिव फार्माक्यूटिकल्स इंग्रेडिएंट्स की सप्लाई यूनीकैम रेमेडीस, लॉरस लैब्स, एबोट इंडिया, रुसान फार्मा, मंगलम ड्रग्स आदि कंपनियां करती हैं।

कीमत: इस दवा की भूमिका जितनी अहम है, उस हिसाब से इसकी कीमत बहुत ही मामूली है। इस संकट काल में यह दवा लोगों के लिए जीवनरक्षक का काम कर रही है। भारत में इस दवा की कीमत करीब 30 रुपये प्रति 10 टैबलेट से भी कम है। दवा की बढ़ती मांग पर इसका उत्पादन बढ़ा दिया गया है।

भारतीय दवा कंपनियों ने इस दवा का उत्पादन बढ़ा दिया है और अप्रैल के अंत तक इसे बढ़ाकर चार गुना अधिक यानी 40 मीट्रिक टन कर लेंगी। वहीं, अगले महीने इसका उत्पादन 70 मीट्रिक टन होने की उम्मीद है। दवा की लागत और कीमत कम होती है। ऐसे में वैश्विक कंपनियों ने इस दवा की मांग कम होने पर बड़े पैमाने पर इसे बनाना बंद कर दिया था। भारतीय कंपनियां ही दुनिया भर में 80 फीसदी मांग पूरी करती है।

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