ग्राहकों का भरोसा खो रही हैं डायग्नोस्टिक लैब

भारत में डायग्नोस्टिक इंडस्ट्री ग्राहकों का विश्वास खोती दिख रही है। लोगों के स्वास्थ्य और इससे जुड़ी समस्याओं की जांच करने वाली लैबोरेटरीज की विश्वसनीयता पर अब सवाल उठने लगे हैं। हाल में जारी हुए एक ऑनलाइन सर्वे के परिणामों से यह जानकारी सामने आई है। इसमें बताया गया है कि हर तीन में से एक व्यक्ति ने लैब में हुए टेस्ट को लेकर शिकायत की है। सर्वे में शामिल लोगों ने लैब परीक्षणों से मिले गलत परिणामों के आधार पर अपनी-अपनी प्रतिक्रिया दी। इसके आधार पर एक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ने परिणाम साझा किए हैं।

सर्वे के परिणाम?
सोशल मीडिया से जुड़े गैरसरकारी कम्युनिटी प्लेटफॉर्म ‘लोकल सर्कल्स’ ने देश के 215 जिलों के 22,000 ग्राहकों से कुछ सवाल किए थे। ये सवाल भारत की मेडिकल प्रयोगशालाओं और टेस्ट करने के उनके तरीकों से जुड़े थे। परिणामों के आधार पर कुछ तथ्य साझा किए गए जो निम्नलिखित हैं-

8,355 ग्राहकों में से 28 प्रतिशत ने माना कि उन्हें लैब टेस्ट पर कम विश्वास है।
इसी सैंपल के तहत सात प्रतिशत ने कहा कि उन्हें लैब टेस्ट पर काफी कम भरोसा है।
वहीं, 48 प्रतिशत ग्राहकों ने कहा कि उन्हें प्रयोगशालाओं पर भरोसा है, लेकिन वे लैब टेस्ट के परिणाम को लेकर सतर्क रहते हैं।
अलग से लैब टेस्ट कराने को कहते हैं डॉक्टर
सर्वे में शामिल 8,333 ग्राहकों ने माना कि डॉक्टरों ने उन्हें अलग (विशेष) डायग्नोस्टिक लैबोरेटरी से टेस्ट कराने का निर्देश दिया था। वहीं, इसी समूह के 29 प्रतिशत लोगों ने कहा कि उन्हें ऐसा कोई निर्देश नहीं दिया गया। यह भी पता चला कि डॉक्टरों के निर्देश पर जो लोग ‘विशेष’ लैब में टेस्ट करा रहे थे, उनमें से तीस प्रतिशत ने टेस्ट रिपोर्ट गलत होने की शिकायत की थी। खबर के मुताबिक ये लोग पिछले तीन सालों से टेस्ट करा रहे थे। वहीं, 8,089 ग्राहकों के एक समूह से कम से कम 34 प्रतिशत ग्राहक ऐसे थे, जिन्होंने पिछले तीन सालों में एक या उससे ज्यादा बार लैब टेस्ट रिपोर्ट गलत पाई थी। हालांकि इस समूह के इतने ही प्रतिशत लोगों ने गलत रिपोर्ट की बात से इनकार किया है।

विशेषज्ञों की राय
सर्वे के परिणामों पर सोशल मीडिया कम्युनिटी प्लेटफॉर्म के एक सदस्य ने कहा, ‘यह सर्वे लैब टेस्ट को लेकर ग्राहकों के कम होते विश्वास को रेखांकित करता है। अब सरकार को लैब टेस्ट से जुड़े मानकों में बदलाव कर इसमें सुधार लाने की जरूरत है।’

साल 2010 में संसद ने ‘क्लिनिकल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट’ पारित किया था। इसके प्रावधानों के मुताबिक, मेडिकल डायग्नोस्टिक लैबोरेटरी समेत सभी चिकित्सा संबंधी संस्थानों को कुछ जरूरी मानकों को पूरा करना अनिवार्य है। हालांकि संस्थानों के न्यूनतम आकार और गुणवत्ता संबंधी इन प्रावधानों को अभी तक ठीक से लागू नहीं किया गया है। यही कारण है कि भारत में जितनी भी प्रयोगशालाएं हैं, उनमें से केवल दो प्रतिशत आकार में बड़ी हैं। वहीं, 18 प्रतिशत मध्यम आकार की हैं और बाकी सभी लैब छोटी हैं। इसीलिए विशेषज्ञ कहते हैं कि इस कानून को ठीक से लागू किए जाने की जरूरत है।

लैबोरेटरी का मान्यता प्राप्त होना जरूरी
भारत में ‘राष्ट्रीय परीक्षण एवं अंशशोधन प्रयोगशाला प्रत्यायन बोर्ड’ (एनएबीएल) गुणवत्ता के आधार पर डायग्नोस्टिक लैबोरेटरी को मान्यता देता है। यह बोर्ड पब्लिक-प्राइवेट-पार्टनरशिप यानी पीपीपी मॉडल के तहत स्थापित की गई भारतीय गुणवत्ता परिषद के तहत आता है। एनएबीएल ने पिछले साल बताया था कि भारत में चल रही एक लाख मेडिकल लैबोरेटरीज में से केवल 1,000 ही उसके द्वारा मान्यता प्राप्त हैं।

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