शिवाजी महाराज की कौनसी बात है, जो सबसे प्रेरणादायक है?

भारत के वीर सपूत छत्रपति शिवाजी महाराज एक महान देशभक्त होने के साथ एक कुशल प्रशासक भी थे।छत्रपति शिवाजी महाराज ने 1674 में मराठा साम्राज्य की नींव रखी।उनका जन्म 19 फरवरी 1630 ई. और मृत्यु 3 अप्रैल, 1680 ई. को हुई।

शिवाजी महाराज के पिता का नाम शाहजी था। वह अक्सर युद्ध लड़ने के लिए घर से दूर रहते थे। इसलिए उन्हें शिवाजी के निडर और पराक्रमी होने का अधिक ज्ञान नहीं था।

किसी अवसर पर वे शिवाजी को बीजापुर के सुलतान के दरबार में ले गए। शाहजी ने तीन बार झुक कर सुलतान को सलाम किया, और शिवाजी से भी ऐसा ही करने को कहा। लेकिन, शिवाजी अपना सिर ऊपर उठाए सीधे खड़े रहे।

एक विदेशी शासक के सामने वह किसी भी कीमत पर सिर झुकाने को तैयार नहीं हुए। इतना ही नहीं किसी शेर की तरह शान से चलते हुए दरबार से वापस चले गए। इसीलिए छत्रपति शिवाजी महाराज को एक कुशल और प्रबुद्ध सम्राट के रूप में जाना जाता है।

एक बार की बात है। शिवाजी के समक्ष उनके सैनिक किसी गांव के मुखिया को पकड़ कर लाए। मुखिया बड़ी और घनी-घनी मूछों वाला बड़ा ही रसूखदार व्यक्ति था। लेकिन आज उस पर एक विधवा की इज्जत लूटने का आरोप साबित हो चुका था।

यह वाकया उस समय का है, जब शिवाजी मात्र चौदह साल के थे। शिवाजी बड़े ही बहादुर, निडर और न्यायप्रिय थे और खास तौर पर उनके मन में महिलाओं के प्रति असीम सम्मान था।

उन्होंने तत्काल अपना निर्णय सुनाया और कहा- ‘इसके दोनों हाथ और पैर काट दो,’ ऐसे जघन्य अपराध के लिए इससे कम कोई सजा नहीं हो सकती।

छत्रपति शिवाजी महाराज जीवनपर्यंत साहसिक कार्य करते रहे और हमेशा गरीब, बेसहारा लोगों को प्रेम और सम्मान देते रहें। ऐसे थे छत्रपति वीर शिवाजी महाराज।

एक प्रसिद्ध किस्सा है, शिवाजी महाराज के साहस का। यह उस समय की बात है, जब पुणे के करीब नचनी गांव में एक भयानक चीते का आतंक छाया हुआ था।

वह चीता अचानक ही कहीं से हमला करता था और जंगल में ओझल हो जाता।

सभी डरे हुए गांव वाले अपनी समस्या लेकर शिवाजी के पास पहुंचे और विनती करते हुए कहा- हमें उस भयानक चीते से बचाइए, महाराज। वह अबतक ना जाने कितने बच्चों को मार चुका है। ज्यादातर वह चीता तब हमला करता है, जब हम सब सो रहे होते हैं।

महाराज शिवाजी ने धैर्यपूर्वक ग्रामीणों की समस्या सुनी और उन्हें ढाढ़स बंधाते हुए कहा- आप लोग निश्चिंत रहे, किसी बात की चिंता मत करिए, मैं यहां आपकी मदद करने के लिए ही हूं।

फिर शिवाजी अपने सिपाहियों यसजी और कुछ सैनिकों के साथ जंगल में चीते को मारने के लिए निकल पड़े। बहुत ढूंढ़ने के बाद जैसे ही चीता सामने आया, सैनिक डर के मारे पीछे हट गए पर शिवाजी और यसजी बिना डरे ही ‍चीते पर टूट पड़े और पलक झपकते ही उस मार गिराया।

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