लकड़हारे ने राजकुमार को दिलाई साधु के श्राप से मुक्ति कहानी

लकड़हारा एक पेड़ को काट रहा था जब जब वह पेड़ पर टांगी चलाता तो उसे किसी के सिसकने की आवाज सुनाई देती कुछ देर तक लकड़हारा हैरान था की आखिर यह आवाज कहा से आ रही है। फिर उसने अपने मन का वहम मानकर फिर से टांगी चलाई। इतने में आवाज आई मैं वह पेड़ बोल रहा हूं जिसे तुम अपने स्वार्थ के लिए काट रहे हो। लकड़हारा समझ चुका था यह आवाज पेड़ ही से आ रही है उसने कहा तुम बोल कैसे रहे हो।

पेड़ ने कहा मैं भी तुम्हारी तरह इंसान था लेकिन साधु के श्राप की वजह से में पेड़ बन गया मैं शिकार करने के लिए इसी जंगल में आया था लेकिन गलती से मेरा तीर साधु को लग गया जिसके बाद उन्होंने मुझे श्राप दे दिया की में इसी जंगल में हमेशा हमेशा के लिए एक पेड़ के रूप में रह जाऊंगा बहुत गिड़गिड़ाने पर मुझे उस साधु ने कहा तुम्हें तभी इस श्राप से मुक्ति मिल सकती है जब को भला आदमी मेरे शरीर के हड्डियों को तुम्हारे तने मे गाड़ेगा तब तुम फिर से इंसान रूप में आ जाओगे और इतनी कहते ही उनकी मृत्यु हो गई और तब से लेकर अब तक में यहीं पर इसी पेड़ के रूप में हूं।

 लकड़़ारे ने पूछा कहां पर उस साधु की मृत्यु हुई थी। पेड़ ने कहा वो सामने की तरफ उनके शरीर कुछ अवशेष जरुर मिलेंगे। लकड़हारे को बहुत ढूंढने पर एक हड्डी का टुकड़ा मिला जिसे फौरन लकड़हारे ने उस पेड़ के तने में गाड़ दिया। अगले पल वह पेड़ एक युवक बन गया जो बहुत ही खूबसूरत था और उसके बाद वह युवक उसे अपने साथ राजमहल ले गया सभी लोग राजकुमार को इतने दिनों बाद देखकर हैरान थे। राजकुमार ने सारी बात अपने परिवार वालों को बताई। खुश होकर राजकुमार के पिता ने लकड़हारा को इनाम दिया लेकिन लकड़हारे ने इनाम नहीं लिया उसने बदले में राजमहल में काम मांगा। राजकुमार के पिता ने उसे काम पर रख लिया अब वह पेड़ को नहीं काटता था।  

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