रेलगाड़ी के इंजन में शौचालय क्यों नहीं होते? जानिए

ये बात सही है कि इंजिनों में शौचालय नहीं होते। ये सभी लोको पायलटों के लिए काफी तकलीफदेह है जो इंजिनों पर लगातार कार्य करते हैं और जरूरत पड़ने पर निवृत होने के लिए ट्रैन रुकने तक इंतज़ार करना उनकी मजबूरी होती है। ये इंतजार कभी-कभी कुछ घण्टों जितना अधिक भी हो सकता है । निवृत होने के लिए लगातार ऐसे इंतजार आगे चलकर कई बीमारियों का कारण बनते हैं।

रेल इंजिनों में शौचालय नहीं होने का कारण शायद ये था कि रेलवे में पटरी पर अपशिष्ट बहाए जाने वाले पारम्परिक शौचालय ही उपयोग में लाये जा रहे थे। जिनसे रेल की पटरियां तो खराब होती थीं , साथ ही वे डिब्बे भी, जिनमे इन्हें लगाया जाता है, उतने हिस्से में काफी खराब हो जाया करते थे। लम्बे समय तक यदि उचित साफ-सफाई एवं रख-रखाव नहीं किया जाए तो डिब्बों में इन शौचालय के नीचे वाले हिस्से में दूसरे हिस्सों की तुलना में ज्यादा तेजी से क्षरण की क्रिया होती है। दुसरीं बड़ी समस्या इनकी साफ-सफाई और रखरखाव में बेतहाशा पानी की जरूरत होती है। फिर इन्हे मानवी हाथों से ही स्वछ करना, ये भी अपने आप में एक बड़ा अमानवीय कृत्य है। उन प्लेटफॉर्मो और स्टेशनों एवं रेल लाइनों, जहाँ यात्री गाड़ियां विशेषतयः सुबह के समय खड़ी रहती हैं, की नियमित साफ-सफाई भी एक समस्या थी।

अगर यही शौचालय इंजिनों में भी लगा दिए गए होते तो इंजिनों के नीचे के हिस्सों का भी यही हाल हो सकता था। साथ ही इंजिनों में रखरखाव के लिए अक्सर निचले हिस्सों में लगे हुए कुछ महत्वपूर्ण उपकरणों की सर्विस नियमित की जाती है, कभी-कभी इन कार्यों को बहुत कम समय में निबटाना पड़ता है, जिससे इंजिन वापस सेवा के लिए जल्दी उपलब्ध हो सके। शौचालय लगाने से इस प्रकार के रखरखाव बिना उचित साफ-सफाई के जल्दी हो पाते, इसमें थोड़ा संशय है।

फिर एक इंजन की उपयोगिता और कीमत दोनों, रेल के डब्बे से कई गुना ज्यादा हैं। इंजिनों में पारंपरिक प्रकार के शौचालयों से क्षरण की क्रिया भी एक बड़ी समस्या थी।

इसके अतिरिक्त, लोको पायलटों को स्वयं भी अपनी ड्यूटी के दौरान जरूरत पड़ने पर इंजिनों के निचले हिस्सों में कुछ गतिविधियां करनी पड़ती हैं, दोष निवारण करने पड़ते हैं। ऐसे में ये शौचालय निश्चित ही परेशानी का कारण बनते।

तो इन कारणों से शुरुआती इंजिनों में शौचालयों की व्यवस्था नहीं कि गई थी, और फिर बाद में बनाये गए इंजिनों को शौचालय लगाए जाने लायक तरीके से तैयार ही नहीं किया गया। लेकिन इसकी जरूरत को कभी भी नकारा नहीं गया।

अब नई तकनीक से युक्त जैव शौचालयों का भारतीय रेल में समावेश किया गया है। जिसकी मुख्य विशेषता यह है कि एक जैव शौचालय प्रणाली एनारोबिक बैक्टीरिया का उपयोग करता है जो अपशिष्ट पदार्थ का उपभोग करते हैं और इसे पानी और गैस में परिवर्तित करते हैं। ये बायो-टॉयलेट अच्छी तरह से काम करते हैं, क्योंकि वे कोच के फर्श के नीचे शौचालय के नीचे फिट किए जाते हैं और मानवीय अपशिष्ट को उनमें डिस्चार्ज कर दिया जाता है।

इसी तकनीक को इस्तेमाल करके अब इंजिनों में भी शौचालयों की व्यवस्था की जा सकती है। जिससे लोको पायलटों को निवृत होने की सुविधा मिलेगी और रख-रखाव सम्बंधी गतिविधियाँ भी आसानी से की जा सकेंगी। और क्षरण की समस्या से भी बचा जा सकेगा।

अभी ऐसे कुछ या शायद ही एक इंजिन प्रायोगिक तौर पर लाइन पर आया भी है, लेकिन अभी तक मुझे उसे देखने का मौका नहीं मिल पाया है, कि उनमें जैव-शौचालय ही लगाया गया है या दूसरे किस्म का शौचालय। जो भी है, प्रायोगिक तौर पर ही सही, इंजिनों में अब शौचालय लगाने की शुरुआत हो चुकी है, और ऐसी उम्मीद है कि सभी इंजिनों में इसे लगा कर लोको पायलटों की एक बड़ी समस्या जल्द ही दूर की जाएगी।

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