पिता जो हारे अपने पुत्रों से – कहानी

कलयुग ऐसा आया है कि जब तक तुम्हारे पास पैसे हैं, तो सभी पूछते है आप कैसे हो ? आपके पास कुछ भी न हो, तो आपकी संतान भी आपकी नही होती। किसी एक नगर में एक बुढे़ इंसान के चार पुत्र थे।

उस बुढे़ ने उन चारों की शादी करवाकर अपने पास रही हुई सारी संपत्ति को चारों पुत्रों में बांट दी और स्वयं धरम आराधना में मस्त हो गया। समय के साथ पत्नियों की वैमनस्य भावना की वजह से अलग होना पडा। इससे उस बुढे़ की भोजन व्यवस्था एक – एक दिन एक – एक पुत्र के यहाँ की गयी।

पहले दिन पहले पुत्र के यहाँ, दूसरे दिन दूसरे के वहाँ। इसमें भी समय के साथ – साथ बहुओं को ससुर खटकने लगे। अतः उन्हें बात – बात पर अपमानित करने लगी। पुत्र वधुओं की मजाक यहाँ तक पहुँची कि वे बुढे़ से कहती पूरा दिन घर में बैठकर हमारा मुँह क्यों देखते हो ?

स्त्रियों के पास पुरुष का रहना योग्य नहीं है। आपको शरम भी नहीं आती ? जाओ दुकान में अपने पुत्रों के पास और हाथ बटाओ। घर से अपमानित होकर दुकान पर जाते हैं तो, वहाँ पुत्र उनको अपमानित करते हैं। पिताजी ! यहाँ क्यों आए इस उमर में तो आपको घर पर रहना चाहिए। आपके दाँत गिर गये हैं।

आंखों से दिखता नहीं है पैर थर – थर काँप रहे हैं। यहाँ क्या काम है। यहाँ पुत्रों से और वहाँ पुत्र वधुओं से अपमानित होकर घर जाते हैं। नाती – पोते भी उन्हें परेशान कर देते हैं। कोई उनकी दाढ़ई खिंचता है तो कोई मूंछ। इस प्रकार सभी उनको तंग करते हैं। पुत्रवधू भी रुखी सुखी रोटी भोजन में परोसती है।

ऐसे पुत्र और बहुओं से परेशान वह आदमी सोचने लगता है कि क्या करुं ? ऐसे तो जीवन गुजरना मुश्किल है। इसी मुश्किल को लेकर वह अपने एक सुनार मित्र के पास जाता है। स्वयं के पराभव एवं उसमें से रास्ता निकलने के उपाय पूछता है।

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