पारले-जी (parle-G) कंपनी कब शुरू हुई तथा कैसे इतनी प्रसिद्ध हुई?

बात सन 1929 की हैं जब स्वदेशी आंदोलन अपने जोरों पर था इसी का फायदा उठाकर मोहनलाल दयाल ( पारले के फाउंडर ) ने मुंबई के पारले में एक कंपनी स्थापित की और कन्फेक्शनरी आइटम बनाने लगे।

पारले कंपनी का पहला उत्पाद था नारंगी टॉफी। इसके साथ कई और तरह की टॉफी भी बनने लगी। आखिरकार 10 साल बाद सन् 1939 में पारले कंपनी ने बिस्किट बनाना शुरू किया।

उस समय बिस्किट बाहरी देशों से आयात किए जाते थे तथा यह बिस्किट सिर्फ अमीर लोगों और बड़े घरानों के लिए ही होते थे और सारे बिस्किट ब्रांड पर ब्रिटिश कंपनियों का कब्जा रहता था।

इसी को देखते हुए कंपनी ने सस्ते बिस्किट बनाने शुरू किए ताकि उनकी पहुंच आम नागरिकों तक आसानी से हो सकें।

भारत में बना होने के कारण और भारतीय लोगों तक आसानी से पहुंच के कारण पारले बिस्किट बेहद प्रसिद्ध हो गया तथा द्वितीय विश्व युद्ध के समय ब्रिटिश इंडियन आर्मी में भी यह बिस्किट काफी चर्चित रहा।

पारले बिस्किट की प्रसिद्धि दिनों दिन बढ़ती गई और 1960 के दशक के समय पारले बिस्किट अपनी सुप्रसिद्ध पीली पैकिंग में आना शुरू हो गया जिस पर चर्चित नन्ही बच्ची का चेहरा छपा रहता था।

1980 के दशक में पारले बिस्किट ग्लूकोस बिस्किट से बेहद प्रसिद्ध हो गया और इसी का फायदा उनकी प्रतिनिधि कंपनियों ने भी उठाया और ग्लूको नाम से बिस्किट निकालने शुरू कर दिए।

बदकिस्मती से पारले कंपनी ग्लूको नाम को पेटेंट नहीं करा पाई और इसी के लिए पारले-ग्लूको नाम बदलकर पारले-जी रख दिया गया और इसे खूब प्रचारित किया गया और यह कंपनी के हक में भी गया।

आज के समय पारले-जी भारत का सबसे बड़ा बिस्किट ब्रांड बन चुका हैं तथा बाजार में ग्लूकोस बिस्किट में इसकी हिस्सेदारी 60% से भी अधिक है।

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