नारद मुनि के गुरु कौन थे ?

एक बार देवताओं और ऋषि मुनियों ने एक सभा का आयोजन किया । सभी ऊचे आसन पे विराजमान थे । नारद जब आए तो उन्हें नीचे बैठाया गया । नारद के कारण पूछने पर पता चला कि — उनके कोई गुरु नहीं हैं इसलिए उन्हें नीचे बैठाया गया । फिर एक दशा रखी गई कि यदि वे किसी को अपना गुरु बना लेते हैं तो उन्हें ऊँचा स्थान मिल जाएगा ।

सुबह सबसे पहले जो व्यक्ति दिखे उसे गुरु बनाना था । वृद्ध मछुवारेे सबसे पहले मिलने पर नारद ने उन्हें अपना गुरु बना लिया ।

वृद्ध ने कहा कि मैं आपके गुरु बनने योग्य नहीं क्योंकि मैने कभी किसी को गुरु नहीं बनाया और न ही किसी मंत्र की दिक्षा ली हैं ।

तब नारद बोले कि आपके मन मे जो भी हैं वह कह दीजिए वही मेरे लिए मंत्र होगा । तो वृद्ध ने कहा — हरि बोल । यह सुनते ही नारद सभा को लौट गए और अपने गुरु के विषय मे बताया और उन्हें मनचाहा स्थान मिला । परंतु सभा के सदस्यो ने गुरु से मिलने की मांग की । नारद दोबारा धरती पर आए और गुरु से मिले । वे वृद्ध थे तो इसलिए नारद उन्हें कंधे पर बैठाकर सभा ले गए । सभा पहुँचते ही सबने नारद के गुरु को प्रणाम किया । वह कोई और नहीं स्वंय महादेव थे ।

यह कथा नारद पंचतंत्र से हैं । वैष्णव मान्यताओं के अनुसार शिव ही नारद के गुरु हैं जिन्होनें नारद को हरि भक्ति की दिक्षा दी ।

वैसे पिता भी पहले गुरु होते हैं । तो उस हिसाब से ब्रह्मा उनके गुरु भी हैं क्योंकि भागवद कथा का ग्यान उन्होंने ही नारद को दिया था ।

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