तीन पुतलियों की मजेदार कहानी

राजा भोज का दरबार ठसाठस भरा हुआ था तब एक परदेशी ने वहाँ प्रवेश किया। उस समय सबकी नजर उस पर पड़ी। उसने राजा भोज को नमस्कार करके स्वयं की झोली में से तीन पुतलियाँ निकाली व उसने कहा -” महाराज! आपसे मेरी नम्र विनंति है कि आप इन तीन पुतलियों की कीमत आँककर बताओ। मैं बहुत सभाओं में गया हूँ, परंतु अब तक कोई भी कीमत नहीं बता सका।

आपकी राजसभा की दूर – दूर से प्रशंसा सुनकर मैं यहाँ आया हूँ। आशा है कि आपके दरबार का कोई बुद्धिमान इन पुतलियों की वास्तविक कीमत जरुर बताएगा। राजा ने पुतलियों को हाथ में लिया व घूमा – फिराकर देखा, परंतु तीनों एक समान नजर आईं। थोड़ा भी अंतर राजा को नहीं दिखा। एक जैसे कान। एक जैसा रंग। इसमें तीनों की अलग – अलग कीमत कैसे आँकना ? राजा ने खड़े होकर सभा में उद्घोषणा की कि जो कोई व्यक्ति इन पुतलियों का मुल्यांकन करेगा उसे सवा लाख स्वर्ण दीनारों का इनाम दिया जाएगा।

इनाम की बात सुनकर बहुत लोगों को लोभ जगा। जिससे बहुत लोग खड़े हुए। सत्य कहेंगे तो इनाम मिलेगा व गलत कहेंगे तो अपने बाप का क्या जाता है। लगे तो तीर नहिं लगे तो तुक्का ऐसा सोचकर बहुत लोग खड़े होने लगे। सबसे पहले चरणदास खड़े हुए। जिनकी होशियारी पूरी धारा नगरी में विशेष जानी जाती थी। उन्होंने तीनों पुतलियों को देखा। बारीक नजरों से सूक्ष्म तरीके से देखकर कहा – इन तीनों पुतलियों की कीमत एक समान है। तब उस परदेशी ने कहा परंतु…… कितनी है? यह तो कहो! इसमें आपका काम नहीं है। तीनों पुतलियों की कीमत में अंतर है, तीनों की कीमत एक समान हो तो मैं परीक्षा करने क्यों आऊंगा। परदेशी का ऐसा स्पष्ट जवाब सुनकर, एकदम निराश होकर चरणदास चुपचाप अपने स्थान पर बैठ गए। फिर तो बहुत लोग आ गये।

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