जो कंबल हमें सर्दियों में गरम रखता है वही कंबल बर्फ को पिघलने से क्यों बचाता है ?

जब हम नहाते हैं तो हमारे आसपास के वातावरण का तापमान नहानेवाले पानी से अधिक होता है। अतः शरीर पर पानी डालकर नहाने पर हमारे शरीर से पानी का वाष्पीकरण होना प्रारंभ हो जाता है। वाष्पीकरण की क्रिया के लिए उष्मा की आवश्यकता होती है। यह उष्मा हमारे शरीर से ही ली जाती है। इसके परिणामस्वरूप हमारे शरीर का ताप पहले की तुलना में कम होने लगता है और हमें ठंडक अनुभव होने लगती है।

ठंडक की कमी या अधिकता वाष्पीकरण की क्रिया के अनुसार ही होती है। यदि वाष्पीकरण अधिक होता है तो ठंडक भी अधिक लगती है और वाष्पीकरण कम होने पर ठंडक भी कम या मामूली-सी लगती है। यदि नहाने के बाद पंखे की हवा में खड़े हो जाएँ तो ठंडक अधिक लगती है; क्योंकि तेज हवा के कारण शरीर से वाष्पीकरण भी अधिक होता है। अतः सर्दी के मौसम के अतिरिक्त नहाने के बाद ठंडक लगने का कारण शरीर से पानी का वाष्पीकरण होना ही होता है।
जो कंबल हमें सर्दियों में गरम रखता है वही कंबल बर्फ को पिघलने से क्यों बचाता है ?

बल न हमें गरम रखता है और न बर्फ को पिघलने से क बचाता है। ऊन का कंबल तो उष्मा या ताप का कुचालक होता है। वह जहाँ भी होता है वहाँ से ताप के आवागमन को रोक देता है। इसीलिए जब सर्दियों में हम कंबल ओढ़ते हैं तो शरीर का ताप बाहर के ठंडे वातावरण में जाने से रुक जाता है और हम अपने ही ताप या उष्मा से अपने आपको गरम अनुभव करते रहते हैं।

कंबल हटते ही हमारा ताप ठंडे वातावरण की ओर जाने लगता है और हमें ठंड लगने लगती है। लेकिन जब हम कंबल से बर्फ को ढक देते हैं तो बर्फ का तापमान शून्य डिग्री सेंटीग्रेड पर ही स्थिर हो जाता है; क्योंकि कंबल के उष्मा के प्रति कुचालक होने से उष्मा का आदान-प्रदान नहीं हो पाता है। इससे बर्फ का तापमान बढ़ता नहीं है और वह पिघलने से बच जाती है।

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