चंड-मुंड कौन थे ? इनका वध किसने किया?

चण्ड, मुंड राक्षस राज शुम्भ निशुम्भ के सेनापति थे. शुम्भ असली राजा थे निशुम्भ उनके भाई थे. चण्ड मुंड भी दो बलवान राक्षस थे. इनको असुर दानव या दैत्य भी कह सकते है. इन सबकी संस्कृति एक ही है की बल से छिन लौ. लूट लौ झपट लौ.

काली चामुंडा एक देवी थी जो ब्रह्मा विष्णु और शिव की तीनो कि सम्मिलित शक्तियों से उतपन्न हुयी थी. असल मे दुर्गा या शक्ति थी, जो पार्वती गौरी रूप थी. इनके रूप की चर्चा शुम्भ के एक दूत ने शुम्भ से की और इस रूपमती देवी को अपने महल मे रखने को उकसाया उसका मतलब बस यही था की राजा खुश होकर उसे भी कुछ अर्थ धन देगा. इससे प्रशन्न और देवी की सुंदरता की प्रशंशा सुनकर आसक्ति हो कर शुम्भ ने सबसे पहले अपने एक सेनापति धूम्रलोचन को भेजा कि देवी को समझा बुझाकर नहि तो धमकाकर ले आये . वह मेरे महल मे रहेगी मुझें वरण करेगी. उसका कहि और जगह क्या काम. देवी ने धूम्रलोचन को भयंकर गर्जना करके शब्द से मारा. तब से ही चंद्रघंटा घंटे के नाद से दुष्ट को नष्ट करने वाली देवी बनी. फिर शुम्भ ने रखतबीज को भेजा सेना बल के साथ.

रखतबीज को समझकर भेजा कि उस कन्या या देवी को पहाड़ से उतरकर मेरे सामने प्रस्तुत करो और उसे समझाओ की शुम्भ कितने महान है. सभी देवता उसके अधीन है और त्रिलोकाधिपति महाराज शुम्भ ही है. जितने भी देवताओं के कार्य है जैसे इंद्र का कार्य गर्जना, बादल लाना, वरुण का कार्य पानी लाना, वारिश करवाना, अग्नि का कार्य जलाना , पवन का कार्य वायु और आंधी, तूफान, तांडव सब महाराज शुम्भ के आदेश से ही हो रहे है. सभी देव उनकी ही आज्ञा पालन कर रहे है. रखतबीज ने देवी को बालिका समझकर पहले समझाया फिर धमकाया और न मानने पर जोर जबर्दस्ती करने लगा. देवी ने रखतबीज से कहा की राजा शुम्भ इतना ही शक्तिशाली और महान है, तो उसे आकर इस पहाड़ से उतरकर बल पुर्वक ले जाय. वह स्वेच्छा से नहि जाएगी. रखतबीज ने शक्ति प्रयोग की. सेना पर देवी ने अपना सिंह को छोड़ दिया और सिंह ने रखतबीज की राक्षस सेना को नस्ट कर दिया. रखतबीज ऐसा योद्धा था जिसके रक्त की बून्द पृथ्वी पर गिरने से उसी की तरह का बलवान योद्धा फिर से पैदा होता था और समर मे युद्ध करता था दुशमन को मार देता था. देवी ने रखतबीज से घनघोर युद्ध किया और वह देवी के काली रूप द्वारा मारा गया.

अब तो शुम्भ बहुत वेचेन हो गया. पगला गया, कि ऐसी कोण लड़की है, जो मेरी अवज्ञा कर रही है. मुझ जैसे बलवान की बात नहि सुन रही है और मेरे सैनिक और बलवान योद्धाओं को ख़त्म करें दे रही है. अब उसने अधीर होकर और अधिक बलवान राक्षस चण्ड और मुंड को सुसज्जित सैन्य बल के साथ भेजा. देवी ने इनसे भयंकर युध किया और इनको भी समाप्त कर दिया.

मार्कण्डेय पुराण मे दुर्गा शप्तशती मे ये सभी युद्ध विस्तार से दिए है की किस तरह देवी ने इन सभी राक्षसों को माता क्या क्या हथियार प्रयोग किये कोनसा रूप धरकर सेना का संहार किया. इन सब राक्षसों के वध के लिए देवी दुर्गा ने काली रूप लिया जिसमे इनकी लम्बी जीभ लपलपाती है आँखे अग्नि स्वरुप है. शरीर काया काली है. गर्दन लम्बी है. शरीर पतला छरहरा है. हर हाथ मे अस्त्र है. एक हाथ मे खप्पर है जिसमे रखतबीज के रक्त को धरती पर नहि गिरने देती बीच मे ही रोक लेती है. इसी क्रम मे अंत मे शम्भ निशुम्भ का भी वध कर देती है और देव लोग प्रशन्न होते है उनको निर्भय करती है. सभी निर्भय होकर देवी को अस्तुति करटे है और वरदान प्राप्त करते है की ज़ब भी धरती पर खतरा होगा, देवी मैय्या जीवन लेकर दुष्ट लोगों से सज्जन लोगों को फिर से निर्भय करेंगी. देवी माँ ने महिसासुर का भी वध किया था. महिसासुर महिस के आकार का असुर था. यह झारखण्ड के अविक्षित आदिवासी खेतड़ी का रहने वाला था. आज भी इसके वंशज असुर शब्द अपने नाम के अंत मे लगते है. जवाहरलाल विश्व विद्यालय के छात्र आजकल भी महिसासुर का गुणगान करते है और देवी कि गरिमा को ठेस पहुंचते है तथा उलटे सीधे उत्सव विश्वविद्यालय मे मनाते है. हिंदू सनातनी परम्परों का मज़ाक़ बनाते है तथा देश कि भोली भली जनता को भड़काते है. ये दुष्ट लोग छात्र भारत विरोधी नारे विश्वविद्यालय परिसर मे लगाकर स्वयं को भारत कि आजादी के रक्षक समझते है. ये भी महिसासुर चण्ड मुंड और शुम्भ निशुम्भ किबतरह ही आवंन्छेनीय व्यवहार अमर्यादित स्वेच्छाचारी व्यवहार करते है. देवी का वाहन सिंह है जो अती घातक शक्तिशाली है. यह सिंह निर्भयता देता है और दुस्टोन को नस्ट करता है. देवी इस पर अस्त्र शस्त्र सहित स्वर होती है.

देवी माता का पूजन साल मे ढो बार नवरातों मे किया जाता है. नवराते नौ दिन चलते है. एक शरद नवराते और दूसरे चेत्र नवराते. नौ दिन देवी की पूजा होती है. देवी को लाल चुनरी पसंद है. नवराते नया काम करने के लिए साल के सबसे शुभ दिन माने जाते है. इन नौ दिनों मे देवी के नौ रूपों की उपासना पूजा अर्चना की जाती है. पुरे भारत मे यह त्यौहार बडे धूमधाम से मनया जाता है. देवी के नौ रूप निम्न है.

शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कुष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायिनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री. माता अभी भक्तो पर आशीर्वाद बनाये रखें. सबका भला करें. राक्षसों को निबटाती रहे. राक्षस अर्थात भक्तजनों के कार्यों मे आने वाली वधाये.

ये जितने भी राक्षस है जिनके नाम महिसासुर, रखतबीज, धूम्रलोचन, चण्ड, मुंड, शुम्भ, निशुम्भ आदि है सभी बुरी शक्तियों, दुर्गुणों के प्रतिक है. ये आसुरी शक्ति है. मनोविज्ञान के अनुसार देवी चमत्कारिक सकारात्मक ऊर्जा है. उनके ज्ञान से धूम्रलोचन अर्थात आँखों पर पड़ा पर्दा, महिसासुर अर्थात भेंसे की तरह बल मे मदांध, रखतबीज अर्थात जो नस्ट ही न हो जिसके लेशमात्र से ही विषयकामनाएं फिर से पुनर्जीवित हो जाती रहेके प्रतिक है. चण्ड मुंड शुम्भ निशुम्भ भी इसी तरह दुर्गनो को दर्शाते है जिनमे घमंड, आतंक दुर्व्यवहार मुख्य है. ये आसुरी शक्तियां व्यक्ति को हमेशा घेरे रहती है और देवीय शक्ति इनसे निजात दिलाने के लिए हमेशा प्रयासरत रहटी है. यह असुर और सुर मुख्यतः मन और आत्मा की लड़ाई है जो निरंतर चलती रहती है.

जो अपनी आत्मा को जगा ले वह देव और अन्यथा असुर है. आसुरी प्रवृत्ति जगाने की आवश्यकता नहि होती वह हमेशा उपस्थित होती है. देवीय शक्ति की कमी होना ही राक्षस वृत्ति है. ज़िस तरह अंधेरा स्वयं ही होता है प्रकाश के करने से ही दुर होता है. अतः प्रकाश करना पड़ता है. प्रकाश ही आत्मा है. देवीय शक्ति है. इनके जाग्रत होने से ही आसुरी शक्ति नष्ट होने लगती है. अतः जो जगा सके जगाओ नहि तो जबतक ये शक्तियां न जगे सब राक्षस ही है. कोई धूम्रलोचन के प्रभाव मे है. कोई राक्ग्टबीज के प्रताप मे और महिसासुर चण्ड मुंड शुम्भ निशुम्भ का प्रताप तो अपराधी ही बना देता है. बड़ा घोर पापी बना देता है . जैसे आजकल निकिता तोमर बल्लभगढ़ मे महिसासुर रूपी तोसीफ द्वारा मार दि गयी. कारण सिर्फ रखतबीज जैसी मनोवृति उस पर हावी हो गयी क्योंकि शक्ति राजनीती की अल्पसंख्यक होने की उसके पास थी और उसने प्रयोग की निर्भय होकर बेचारी बालिका निरीह और अनायास ही बिना अपराध किये स्वयं कि रक्षा करने मे अकारण ही उसकी शिकार बन गयी. कभी देवी भी भारी पड़ जाती है और दुष्ट को नष्ट कर देती है. वरना आजकल रोजाना देवी हार रही है, चाहे हाथरस की मनीषा हो, बरेली हो, कठुआ की आसिफा हो या बल्लभगढ़ की निकिता. अचम्भा ये कि लोग इसमें धर्म जाती ढूंढ़कर ही विशेष एजेंडा के तहत किसी मुद्दे को उठाते है और दूसरे मुद्दे को चुप रहते है.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *