गांधी और भगत सिंह की विचारधारा समकालीन होने के बाद भी भिन्न क्यों थी,जानिए

महात्मा गांधी हमारे देश के राष्ट्रपिता है और भगत सिंह युवाओं के प्रेरणा स्रोत दोनों का लक्ष्य एक ही था भारत की आजादी, पर सोच और रास्ता एक दूसरे से बिल्कुल अलग था अब समझने वाली बात यह है कि दोनों एक ही समय में रहे फिर भी एक दूसरे की विचारधाराओं पर प्रभाव नहीं डाल पाए ऐसा क्यों हुआ इसको हमें समझने के लिए संक्षिप्त रूप से गांधी और भगत सिंह को जानना होगा।

जहां गांधी जी ने दक्षिण अफ्रीका मैं अहिंसा और असहयोग आंदोलन के प्रयोगों से सफलता पाई थी वही भारत लौटने के बाद उसी सफलता को बार-बार दोहराने के लिए यहां पर भी उसको लागू किया ,गांधीजी के आंदोलनों की मुख्य रणनीति को अगर समझे तो उन्होंने लोगों की छोटी परेशानियों को समझा उनको स्थानीय मुद्दा बनाया फिर बड़े रूप में लोगों का समर्थन लिया और उसे राष्ट्रीय मुद्दा बना दिया फिर अंग्रेजों पर दबाव डालकर देश के पक्ष में फैसले करवाने में सफलता प्राप्त की.

इसमें इस बात का ध्यान रखा की अहिंसा का रास्ता किसी भी कीमत पर नहीं छोड़ा जाएगा अगर आंदोलन के बीच में कभी भी हिंसा हुई तो गांधी जी ने आंदोलन को पीछे ले लिया यह उनका मुख्य सिद्धांत था आंदोलन करने का जिसको वह हमेशा प्रयोग करते रह.

वहीं दूसरी तरफ भगत सिंह जिनका बचपन जलियांवाला बाग जैसी घटनाओंं को देखते हुए बीता था और उनके अंदर एक आक्रोश था जो किसी भी देश के युवा में होता है इसलिए उन्होंने क्रांति का रास्ता चुना अर्थात जहां गांधी जी किसी परिवार के बड़ेे बड़े बुजुर्ग की तरह भूमिका निभाकर आजादी पाना चाह रहे थे वही भगत सिंह उसी परिवार के नौजवान की तरह बदलाव को तुरंत लागू करना चाह रहे थे , आजादी की राह में दोनों ही लोग समानांतर चल रहे थे ,साथ ही देश के लोग चाहे वह गांधी की विचारधारा से प्रभावित हो या फिर भगत सिंह की दोनों ही प्रकार की विचारधाराओं के लोगो को एक अंतिम लक्ष्य भारत की आजादी से जोड़े रखा और जब कभी देश के नेता जेल में थे या फिर लीडरशिप की कमी रहती है उस समय भी भारत के क्रांतिकारी अपनी घटनाओं से देश में वह रिक्त स्थान भरने का कार्य किया करते थे और आजादी की ज्वाला देश वासियों के हृदय में जलाए रखते थे . “}

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