क्या तुलसीदास ने भगवान को देखा था? जानिए

हाँ । इस विषय मे कहा जाता है कि तुलसीदास जी कथावाचक थे । वे जब नित्य क्रिया से वापस लौटते थे तो कमंडल का बचा हुआ जल बबूल का एक पेड़ था उसमें डाल देते थे जिसमें एक प्रेत रहता था ।उस पानी से उसकी प्यास बुझ जाती थी ।एक दिन प्रसन्न होकर वह प्रकट हो गया और तुलसीदास जी से इच्छित माँग माँगने के लिए कहा ।

तुलसीदास जी ने कहा कि मुझे भगवान राम के दर्शन करवा दो ।प्रेत ने कहा कि अगर मेरी पहुंच भगवान तक होती तो मै प्रेत क्यों होता लेकिन मै तुम्हें उनसे मिलने का उपाय बता सकता हूँ । मैं अपने दुश्मन को भली भाँति पहचानता हूँ।हनुमान जी मेरे दुश्मन हैं ।

भूत पिशाच निकट नहि आवैं ।महावीर जब नाम सुनावै ।

उस प्रेत ने बताया कि जो कथा आप कहते हैं उसे सुनने के लिए वे प्रति दिन आते हैं।वे कथा प्रारम्भ के पहले आते हैं और सबसे बाद मे जाते हैं ।वे तुम्हें भगवान के दर्शन करा सकते हैं ।वे कोढी का रूप धारण कर आते हैं ।तुलसीदास जी ने हनुमानजी को खोज निकाला और उनसे भगवान राम का दर्शन कराने की प्रार्थना की ।हनुमानजी ने कहा कि अगर उनके दर्शन करने हैं तो चित्रकूट जाओ वहाँ तुम्हें उनके दर्शन होंगे।

गोस्वामी जी चित्रकूट गए और रामघाट पर अपना आसन जमाया ।एक दिन वे प्रदक्षिणा करने निकले थे तो उन्हें रास्ते में भगवान राम के दर्शन हुए लेकिन वे उन्हें पहचान नहीं सके ।हनुमानजी के भेद बताने पर वे पछताने लगे ।हनुमानजी ने उन्हें सान्त्वना दी कि प्रातःकाल फिर दर्शन होंगे ।1607 मौनी अमावस्या को भगवान राम फिर प्रकट होकर चन्दन माँगने लगे ।पहचानने में भूल न हो इसलिए हनुमानजी ने तोते का रूप धारण कर यह दोहा कहा ।

चित्रकूट के घाट पर भई सन्तन की भीर ।

तुलसीदास चन्दन घिसैं ,तिलक देत रघुवीर ।।

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