क्या कार चलाने से ज्यादा आसान है ट्रेन चलाना? जानिए

जी हाँ, जैसे एक प्रकार से कार चलाना साईकल चलाने से ज्यादा आसान है, उसी प्रकार ये बात भी सही है कि ट्रेन चलाना कार चलाने से ज्यादा आसान है।

साईकल चलाते वक्त चालक को साईकल चलाने के लिए दोनों पहियों पर संतुलन साधना पड़ता है, जो कि कुछ लोगों के लिए मुश्किल हो सकता है। लेकिन वहीं कार चलाते समय ऐसा कोई संतुलन बनाने की आवश्यकता नहीं होती, तो यदि एक बार सामान्य नियंत्रण उपकरणों जैसे क्लच, ब्रेक एवं एक्सीलेटर का उपयोग करना सीख लिया जाए तो स्टीयरिंग व्हील के साथ इन सभी का सही तालमेल बिठाते हुए कार को साईकल से ज्यादा आसानी से चलाया जा सकता है।

लेकिन कार के स्टीयरिंग व्हील को सही तरीके से गति को नियंत्रित करते हुए सही दिशा में घुमाना ही कठिन काम होता है, जिसके लिए निरंतर अभ्यास की जरूरत होती है। जबकि इसकी आवश्यकता ट्रेन चलाते वक्त नहीं होती, यानी कि ट्रेन बिना स्टीयरिंग व्हील वाली कार है।

तो ट्रेन चलाते समय चालक को ना तो कोई संतुलन बनाना है और ना ही सीधा चलाने एवं आवश्यक होने पर दाएँ- बाएँ मुड़ने के लिए स्टीयरिंग व्हील पर नियंत्रण रखने की आवश्यकता होती है, अतः कहा जा सकता है कि यदि वहाँ सिर्फ ब्रेक रिलीज करके एक्सलरेट करने का आईडिया समझ में आ गया तो ट्रेन को चलाना कार चलाने से ज्यादा आसान काम है।

लेकिन जरा रुकिए, क्या ट्रेन को चलाना सचमुच इतना आसान काम है, तो फिर मुश्किल क्या है?

ट्रेन को एक्सलरेट करके गति बढ़ाना सचमुच बहुत आसान काम है, इतना कि यदि किसी छोटे बच्चे को भी ये सिखा दिया जाए तो बिना किसी अभ्यास के वो भी आसानी से ट्रेन चला सकता है। लेकिन ट्रेन के संचालन के दौरान, चलती हुई ट्रेन को सही समय पर, सही तरीके से और सही जगह पर रोकना निश्चित ही आसान काम नहीं है, और जिसे करने में बहुत ही अभ्यास और अनुभव की जरूरत पड़ती है।

ये लगभग हवाई जहाज उतारते समय उसकी सही- सलामत लैंडिंग करने जैसा ही है। यही कारण है कि महीनों के सघन प्रशिक्षण की बावजूद भी किसी चालक को एकदम से यात्री ट्रेनें चलाने को नहीं दी जाती है। यहाँ तक कि शुरुआती वर्षों में तो उन्हें सहायक चालक के तौर पर कार्य करते हुए सिर्फ मुख्य चालक को ट्रेन संचालन में मदद करनी है। फिर कुछ सालों के बाद ही स्वतंत्र रूप से ट्रेन चलाने की अनुमति मिलती है, वो भी मालगाड़ी। और मालगाड़ी चालक के तौर पर अच्छा- खासा अनुभव होने के बाद ही यात्री ट्रेन चलाने की अनुमति मिल पाती है। जबकि ट्रेन चलाना तो कार चलाने से आसान कार्य है, फिर ऐसा क्यों?

एक ट्रेन का वजन इतना अधिक होता है कि जब वो ज्यादा या कम, किसी भी गति पर चल रही होती है तो उसे रोकने के लिए कहाँ से, कितनी मात्रा में, किस प्रकार ब्रेकिंग करनी है कि उसे सही जगह पर, उचित प्रकार से रोका जा सके, इसके लिए कौशल की जरूरत होती है।

मालगाड़ियों के मामले में लाल सिग्नल से बहुत ज्यादा पहले रुकने की वजह से पीछे का पॉइंट क्लियर नहीं होता, जिसके चलते पीछे से दूसरी ट्रेन को लाइन क्लियर देने में देरी हो सकती है। लेकिन यहाँ तो फिर भी एक बार ट्रेन खड़ी होने के बाद धीरे- धीरे आगे लिया जा सकता है, और फिर पीछे का पॉइंट क्लियर होने पर वापस खड़ा किया जा सकता है। मगर यात्री ट्रेनों के मामले में तो इन्हें प्लेटफार्म पर एकदम सही जगह पर खड़ा किया जाना जरूरी है, ताकि ट्रेन के सभी डिब्बे प्लेटफॉर्म पर लगाए गए इंडिकेटरों के सामने ही रुकें। और यहाँ पर एक बार पीछे रुकने के बाद ट्रेन को तुरंत आगे भी नहीं ले सकते, नहीं तो यात्रियों को ट्रेन के तुरन्त रवाना हो जाने की गलत- फहमी के कारण प्लेटफॉर्म पर भगदड़ भी मच सकती है। यात्री ट्रेनों को इस प्रकार एकदम सटीक जगह पर ले जा कर खड़ा करने को पिन पॉइंट हाल्ट लेना कहा जाता है, और जिसके लिए लगातार अभ्यास और अनुभव की जरूरत होती है।

जबकि लाल सिग्नलों एवं आपातकाल में ट्रैक पर उपस्थित किसी भी अवरोध के पहले, सुरक्षित दूरी पर ट्रेन को रोका ही जाना चाहिए, नहीं तो दुर्घटना हो जाएगी, जिसकी वजह से जान और माल, दोनों का नुकसान होगा।

इस प्रकार ट्रेन चलाना कार चलाने से आसान है, ये वक्तव्य आधी सच्चाई भर है। सिर्फ मोबाइल एप्स में ट्रेन चलाने भर लायक अनुभव के आधार पर वास्तविक ट्रेन संचालन कर पाने की बात करना पूरी तरह से सही नहीं है।

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