कलयुग के बेटो की पढ़े परीवार से जुडी दिलचस्प कहानी

किसनलाल अपनी बीबी शांती और लड़के विजय और चंदू के साथ रहता था।किसनलाल अपने मालिक के यहाँ काम करता था।उसके मालिक का कोई भी इस दुनिया में नहीं था शिवाय किसनलाल को छोड़के।दिवाली के दिन किसनलाल ने अपने बेटो के लिए नये कपड़े ख़रीदा और अपने बच्चों को दे दिया तब शांती कहने लगी की,अजी आप ऐसे पैसा अपने बच्चों पर खर्च करते रहोंगे तो हम बुढ़ापे में क्या खायेंगे।पर किसनलाल उसकी बातो पर ध्यान नहीं देता और हमेशा अपने बच्चों के बारे में सोचता रहता है।कुछ दिनों बाद चंदू किसी पैसे वाली लड़की से शादी करके घर जवाई चला जाता है और विजय भी शादी करके घर में बहु ले आता है।एक दिन बहु बाजार जाती है.

और घर वापस आती है तब देखती है की उसकी आलमारी से पैसा गायब है तभी साँस बताने लगती है की उसके पती किसनलाल की तबियत ख़राब हो गयी थी इस कारण उसको पैसे निकालना पड़ा।पर अब बेटा विजय भी अपनी बहु की तरफ से बोलने लगता है और अपने माता पिता को घर से निकलने को कहता है।किसनलाल अपने मन में सोचता है की कलयुग के बेटे शायद यही है तब वह घर से निकलकर एक झोपड़ी में रहने लगते है तभी अचानक किसनलाल के मालिक की तबियत खराब हो जाती उस दिन वह अपनी सारी संपती किसनलाल के नाम पर कर देता है और वह गुजर जाता है।

अब किसनलाल बड़े बंगले में रहने लगता है और उसके पास अब अच्छी वाली कार भी होती है।कुछ दिनों बाद चंदू का ससुर उसे घर से निकाल देता है जिसकी वजह चंदू अब अपने घर की तरफ बढ़ने लगता है।घर आने के वह देखता है की विजय भी अपनी नोकरी से हाट धो बैठा है जिसके कारण उसकी बीबी नाराज है।

अब विजय और उसकी बीबी साथ में चंदू अपने माता पिता के पास रहने के लिए जाते है।जब वो तीनो उनके घर के पास पहुँचते है तब देखते है की,किसनलाल का बोहत बड़ा बंगला है और सामने किंमती कार भी खड़ी है।विजय की बीबी वह सबकुछ देखकर अपने साँस ससुर की उमर भर सेवा करने की इच्छा करती है।

तभी उनके सामने किसनलाल और उसकी बीबी शांती आती है और उन्हें नहीं पहँचानाते कहँकर अपने गेट के बाहर भगा देते है।विजय चंदू रोते रोते इधर उधर घुमने लगते है तब उनको पता चलता है की माँ बाप को छोड़ना याने सबकुछ छोड़ना होता है।

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