अंधविश्वास पड़ा भारी – शिक्षाप्रद बाल कहानी

एक गाँव में एक व्यक्ति रहता था। उसका एक होशियार और समझदार भाई था। गाँव भी सुंदर व हरा भरा था, वहाँ लोग बिना किसी लालच के एक दूसरे की सहायता के लिए सदैव तत्पर रहते थे। बच्चों ! अपने में भी अगर परस्पर सहयोग की भावना जाग उठे तो समझो अपना बेड़ा पार है।

भाई भी दयालु, परोपकारी एवं ईश्वर पर संपूर्ण श्रद्धा रखने वाला व्यक्ति था। गाँव नदी के किनारे बसा हुआ था। एक दिन नदी में जबरदस्त बाढ़ आ गई। संपूर्ण गाँव पानी में डूबने लगा। मेरे बच्चों ! ख्याल है न तुमको! अभी कुछ दिन पहले भूकम्प आया था, तो कैसी हालत हुई थी। इसलिए तुम सभी जीवन को सच्चा और सुंदर बनाओ। जीवन में से बुरे गुण निकाल दो और सद्गुण आत्मसात करो।

सभी को अपनी जान बहुत प्यारी है। गाँव के सभी लोग, गाँव छोड़कर जाने लगे। सभी ने उस भाई को भी चलने को कहा। परंतु वह तो भगवान में अपार विश्वास रखने वाला था, इसलिए लोगों से बोला ‘आप सभी जाईये, मेरी चिंता मत कीजिये, मेरे भगवान मुझे बचा लेंगे।’ मुझे पूर्ण विश्वास है मेरे भगवान पर। ऐसी श्रद्धा होना बहुत अच्छी बात है, परंतु इसके साथ विवेक होना भी जरुरी है।

समझ रहित श्रद्धा बेकार है। पानी की मात्रा बढ़ती गई। पानी घुटनों से बढ़कर कमर तक आ गया फिर भी ये महाशय तो भगवान के भरोसे बैठे हुए थे। गाँव का एक दयालु व्यक्ति उन्हें बचाने के लिए नाव लेकर आया, परंतु उनकी तो वही जिद। फिर तो पानी सिर तक आया और एक हेलीकाप्टर बचाने हेतु आया नीचे सिढ़ी डाली और उस भाई से उसके सहारे ऊपर आने को कहा। परंतु उन्होंने हंसकर मना कर दिया।
एक कहावत है – “लक्ष्मी जब तिलक करने के लिए आए, तब मुंह धोने नहीं जाना चाहिए।” बस फिर क्या था। थोड़े ही समय में वे डुब गए और उनकी मौत हो गई। उपर जाने के बाद यमदूत उन्हें भगवान के पास ले गए। तब वे भगवान को मारने दौड़े।

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